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2020 आंदोलन की बात अलग थी, इस बार प्रदर्शनकारी किसानों के बदनाम होने का है खतरा

केंद्र और किसानों के बीच वार्ता चल रही है, लेकिन स्थिति तनावपूर्ण है। किसान बैरिकेड्स तोड़ने और पुलिस पर आग लगाने वाले बोरे फेंक रहे हैं, जिसके जवाब में पुलिस आंसू गैस और छर्रों वाले हथियारों का इस्तेमाल कर रही है। राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से यह दूसरा किसान आंदोलन पहले से कितना अलग हो सकता है? इसका जवाब देने के लिए आइए हम 2020-21 के किसान आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव का संक्षिप्त मूल्यांकन करें।

2020-21 किसान आंदोलन का प्रभाव: वह आंदोलन राजनीतिक चर्चाओं को प्रभावित करने में सफलता जरूर पाई, लेकिन चुनावी नतीजों पर इसका असर नहीं के बराबर ही पड़ा। भाजपा-अकाली दल गठबंधन टूटा: उस आंदोलन ने पंजाब में भाजपा और अकाली दल के गठबंधन को तोड़ दिया, जो विपक्ष के लिए एक मजबूत राजनीतिक हथियार बन गया। आंदोलन की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रिय सरकार को आखिरकार हार कबूल करनी पड़ी, जो काफी दुर्लभ है। आंदोलन की ताकत इसके सरल संदेश में छिपी थी – वंचित किसान बनाम विनाशकारी कृषि सुधारों पर अड़ी सरकार।

चुनावों में प्रभाव सीमित: लेकिन, इसका चुनावी असर 2022 के यूपी चुनावों में सिर्फ 12 विधानसभा सीटों तक ही सीमित रहा। इन सीटों पर भी भाजपा को ही किसानों के वोट मिले। एक सर्वेक्षण से पता चला कि पूरे प्रदेश के साथ-साथ इन सीटों पर भी किसान परिवारों ने भाजपा का ही साथ दिया। दरअसल, सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे में साफ हो गया कि समाजवादी पार्टी पर बीजेपी की बढ़त गैर-किसान परिवारों से भी ज्यादा किसान परिवारों में मिली। मतलब यही निकाला जा सकता है कि किसान आंदोलन की राजनीति चुनावों में कट्टर राष्ट्रवाद और धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण से अलग दिशा देने में विफल रही।

विभाजित समाज: यह आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि विरोध करने वाले किसान (पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में) जाति और वर्ग के आधार पर बंटे हैं। प्रभावशाली जमींदार जाटों, सीमांत ओबीसी किसानों और दलित कृषि मजदूरों के हितों के बीच विरोधाभास राजनीतिक दृष्टि से ‘ग्रामीण बनाम शहरी’ नैरेटिव के मुकाबले भी ज्यादा प्रभावी है।

शहरी और ग्रामीण जीवन में अंतर वास्तविकता के धरातल पर उस हद तक महसूस नहीं होता है जितना ग्रामीण इलाकों में विभाजन का असर दिखता है। इसके अलावा, पिछले तीन दशकों में बढ़ी हुई कनेक्टिविटी ने ग्रामीण और शहरी के बीच जानकारी के स्तर पर अभाव को बहुत हद तक पाट दिया है। साथ ही किसानों और अन्य लोगों के जीवन यापन में बहुत अंतर भी नहीं रह गया है। उदाहरण के लिए, 2012 के आईएचडीएस सर्वे के अनुसार हरियाणा की एक चौथाई से भी कम आबादी खेती को अपनी आजीविका का मुख्य साधन मानती थी। यह अनुपात और कम हो गया होगा क्योंकि ग्रामीण परिवार अलग-अलग स्रोतों से कमाई के रास्ते पर लगातार आगे बढ़ रहे हैं।

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