रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1947 के भूमि हस्तांतरण से जुड़े विवाद का निपटारा करते हुए महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। न्यायमूर्ति एसके द्विवेदी की अदालत ने एसएआर अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकार के आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे अंतराल के बाद दायर बहाली की कार्यवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि मामला समय सीमा और रेस-ज्यूडिकाटा के सिद्धांत से बाधित था। अमर कुमार चौधरी की याचिका को अदालत ने स्वीकार कर लिया। 28 जून 2008 का अपीलीय आदेश निरस्त कर दिया गया। 21 अक्टूबर 2008 का पुनरीक्षण आदेश भी रद्द कर दिया गया। अदालत ने वर्ष 1988 के मूल आदेश को वैध और अंतिम माना। इससे पहले पारित आदेश को पूरी कानूनी मान्यता मिली। हालांकि इस संबंध में मंत्री कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
याचिका में कहा गया कि वर्ष 1947 में 1.32 एकड़ भूमि खरीदने के बाद परिवार लगातार कब्जे में था। वर्ष 1962 में विवाद उत्पन्न होने पर टाइटल सूट दायर किया गया। वर्ष 1965 में दोनों पक्षों के बीच समझौते से मामला समाप्त हो गया। बाद में वर्ष 1986-87 में एसएआर वाद दर्ज किया गया। 26 अगस्त 1988 को पारित आदेश के अनुसार दूसरी भूमि प्रतिवादी को हस्तांतरित की गई। आदेश के अनुपालन में पंजीकृत बिक्री विलेख तैयार हुआ। म्यूटेशन की प्रक्रिया भी पूरी कर दी गई। अदालत ने कहा कि इस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई। इसके बावजूद वर्ष 2006 में नया एसएआर वाद दायर किया गया। बाद की कार्यवाही पर ही यह पूरा विवाद खड़ा हुआ।
हाईकोर्ट ने कहा कि इतने वर्षों बाद दोबारा विवाद उठाना कानून के अनुरूप नहीं था। अदालत ने माना कि पहला आदेश अंतिम हो चुका था। इसके बाद नया वाद दायर करना उचित नहीं था। कोर्ट ने कहा कि रचनात्मक रेस-ज्यूडिकाटा का सिद्धांत यहां पूरी तरह लागू होता है। अदालत ने उपलब्ध दस्तावेज और गवाहों के बयान भी देखे। रिकॉर्ड में भूमि पर संरचना होने के पर्याप्त संकेत मिले। इसके बावजूद अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकार ने विपरीत निष्कर्ष निकाला था। सरकार भी अपने दावे के समर्थन में मजबूत साक्ष्य पेश नहीं कर सकी। इसलिए दोनों आदेशों को रद्द कर दिया गया। हाईकोर्ट ने वर्ष 1988 के मूल एसएआर आदेश को प्रभावी बनाए रखा।



