बोकारो स्टील प्लांट के सभी 11 गेट बंद होने के विवाद पर झारखंड हाईकोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई की। पूजा अवकाश के दौरान हुई इस सुनवाई में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड की याचिका पर विचार किया गया। सेल ने अदालत को बताया था कि प्लांट के प्रवेश और निकास द्वारों पर अवरोध के कारण कामकाज प्रभावित हो रहा है। कंपनी के मुताबिक, कर्मचारियों के साथ रखरखाव दल और जरूरी औद्योगिक सामग्री की आवाजाही भी बाधित थी। मामले की तात्कालिकता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर विशेष पीठ बनाई गई। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद ने मामले की सुनवाई की। अदालत में बोकारो के उपायुक्त अजय नाथ झा और पुलिस अधीक्षक नाथू सिंह मीणा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़े। उपायुक्त ने कहा कि प्रशासन ने आंदोलनकारियों को हटाने के लिए जरूरी कदम उठाए हैं। उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि प्लांट के सभी गेट अब खुल चुके हैं। सेल के वकील ने कंपनी से पुष्टि करने के बाद अदालत को बताया कि शेष दस गेट भी खोल दिए गए हैं। इसके बाद अदालत ने कर्मचारियों और अधिकारियों की आवाजाही सामान्य होने की जानकारी दर्ज की। उपायुक्त ने कहा कि आगे भी प्लांट के संचालन में किसी तरह की बाधा नहीं आने दी जाएगी। उन्होंने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कार्रवाई जारी रखने का भरोसा दिया। अदालत ने इस आश्वासन के आधार पर गृह सचिव को फिलहाल तलब नहीं किया। उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक को अपने बयान की पुष्टि करते हुए शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश मिला। अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2026 को होगी।
सेल ने अपनी याचिका में कहा कि 16 अक्टूबर की सुबह से सभी गेटों पर अवरोध पैदा किया गया था। कंपनी का दावा था कि इससे करीब 3500 कर्मचारी और श्रमिक प्लांट के भीतर फंस गए थे। उनकी शिफ्ट बदलने में कठिनाई आ रही थी और बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी चुनौती बन गया था। याचिका के अनुसार, फंसे लोगों को भोजन, पानी और आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराने में परेशानी हो रही थी। कंपनी ने यह भी बताया कि बोकारो स्टील प्लांट लगातार चलने वाली औद्योगिक प्रक्रियाओं पर आधारित है। यहां ब्लास्ट फर्नेस, पिघले लोहे, उच्च दबाव वाली पाइपलाइन और संवेदनशील गैस प्रणालियां काम करती हैं। इसलिए जरूरी कर्मचारियों और आपूर्ति का रुकना गंभीर औद्योगिक दुर्घटना का कारण बन सकता है। सेल ने चेताया कि संयंत्र अचानक बंद होने पर करीब 12 हजार टन पिघला हुआ स्टील ब्लास्ट फर्नेस में जम सकता है। ऐसी स्थिति से आर्थिक नुकसान के अलावा पर्यावरण और मानव जीवन को भी खतरा हो सकता है। कंपनी ने गतिरोध दूर कराने के लिए हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप मांगा था। पत्र में बोकारो की विधायक श्वेता सिंह और विस्थापित अप्रेंटिस संघ के आंदोलनकारियों पर गेटों पर अवरोध पैदा करने का आरोप लगाया गया था। सुनवाई के दौरान सेल की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा ने ऑनलाइन माध्यम से पक्ष रखा। अधिवक्ता बिभाष सिन्हा और ऋषव राज भी कंपनी की ओर से मौजूद रहे। राज्य सरकार का पक्ष अपर महाधिवक्ता जय प्रकाश ने रखा। अदालत ने उपायुक्त से पूछा कि क्या आंदोलनकारियों के कारण स्थिति नियंत्रित करने में उन्हें कोई परेशानी हो रही है। उपायुक्त ने कहा कि वह स्थिति संभालने में सक्षम हैं और किसी वरिष्ठ अधिकारी को बुलाने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने फिलहाल विधायक श्वेता सिंह और विस्थापित अप्रेंटिस संघ को नोटिस जारी नहीं किया।
सुनवाई में विस्थापितों की नियुक्ति से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दो पुराने आदेश भी सामने आए। पांच मार्च 2008 के आदेश में भूमि अधिग्रहण से प्रभावित 970 लोगों के नामों पर समान शर्तें पूरी होने पर नियुक्ति के लिए विचार करने और प्राथमिकता देने की बात कही गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि इस आधार पर किसी को नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं मिलता। 27 सितंबर 2019 को शीर्ष अदालत ने संबंधित आवेदन खारिज कर दिया था। उस आदेश में कहा गया था कि मामले को अब समाप्त किया जाना चाहिए और पहले से लंबित नहीं रही सिविल अपील में ऐसे आवेदन पर विचार नहीं किया जा सकता। सेल ने इन आदेशों का हवाला देकर मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि अदालत के सामने रखी। हाईकोर्ट ने फिलहाल प्लांट में सामान्य कामकाज और कर्मचारियों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के प्रशासनिक आश्वासन पर भरोसा जताया। अदालत ने दोनों जिला अधिकारियों को अगली सुनवाई से पहले शपथपत्र दाखिल करने को कहा। अब मामले की समीक्षा 28 अक्टूबर 2026 को की जाएगी।



