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भैंस बेचकर और कर्जा लेकर खोली थी दुकान दंगाइयों ने जला दी, 12 लोगों के परिवार पर अब रोजी-रोटी का संकट, पढ़ें नूंह पर ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट

ओकेश को जब पड़ोसियों से खबर मिली की दंगाइंयों ने उसकी दुकान जला दी, उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। आंखों के आगे अंधेरा छा गया और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर गया। ओकेश के पूरे परिवार की कमाई का जरिए नूंह के जुम्मा बाजार में उसकी छोटी सी एक रेडिमेट कपड़ों की दुकान थी। जैसे ही उसे होश आया वह उठकर दुकान के लिए भागा, लेकिन पूरे शहर में उपद्रव हो रहा था।आधे रास्ते ही उसे वापस लौटना पड़ा। अब ओकेश को चिंता खाए जा रही है कि उसके परिवार का खर्चा कैसे चलेगा। लोकेश के पिता के फेफड़े खराब हो चुके हैं। परिवार के 12 सदस्यों के भरण-पोषण के लिए एक मात्र ही यह दुकान थी।नूंह में 31 जुलाई को दंगे की चपेट ओकेश की पूरी जिंदगी की कमाई तबाह हो गई। रुंधे गले से ओकेश बताते हैं कि करीब 5 साल पहले अपनी भैंस बेचकर और लोगों से कुछ कर्जा लेकर नूंह के शमशान घाट के पास जुम्मा बाजार में उन्होंने अपनी रेडिमेट कपड़ों की दुकान शुरू की थी। लोकेश के पिता मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते थे, लेकिन बर्तन बनाते-बनाते उन्हें फेफड़ों की बीमारी हो गई। उनका काम बंद हो गया। यह परिवार नूंह से करीब 7 किलोमीटर दूर मालव गांव में रहता है और दुकान नूंह में थी। ओकेश का कहना है कि 31 जुलाई को महीने का आखिरी दिन होने के कारण दुकान बंद थी। वे रोज सुबह अपनी दुकान पर आते थे और शाम को वापस अपने गांव लौट जाते थे। सोमवार यानी 31 जुलाई को उनके पास पड़ोसियों का फोन आया कि उनकी दुकान को दंगाइयों ने जला दिया है। यह सुनते ही उनकी हालत बिगड़ गई। वे दुकान बचाने के लिए नूंह की ओर भागे लेकिन शहर में उपद्रव देख वापस ही लौटना पड़ा।ओकेश बताते हैं कि अब उन्हें चिंता सता रही है कि जिन लोगों से कर्जा लिया था उसे कैसे चुकाएंगे। अब तो रोजगार का कोई जरिया भी नहीं बचा। दुकान के साथ साथ पूरे परिवार के सपने भी उस आग में स्वाह हो गए। ओकेश की पत्नी, उनका भाई मिलकर इस दुकान को चलाते थे। ओकेश के 4 बच्चे हैं। उनके माता-पिता और भाई भी उनके साथ रहते हैं। ऐसे में उनके पालन पोषण अब कैसे होगा कुछ समझ नहीं आ रहा है। दुकान के अंदर करीब 10 लाख रूपए का सामान था जो दंगाइंयों ने जलाकर राख कर दिया। आग में दुकान के अंदर रखे सब कपड़े राख हो गए। निराशा से भरे ओकेश कहते हैं कि उन्हें अब मदद का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा। अब कैसे बच्चों को खिलाएंगे उन्हें समझ नहीं आ रहा है। दंगाइंयों ने उनकी जीवन भर की रोजी-रोटी का जरिया ही जला दिया। यह कहते कहते ओकेश की आंखें भर आती हैं।

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