झारखंड में देशी शराब की बिक्री में पिछले कुछ वर्षों के दौरान लगातार गिरावट दर्ज की गई है। उत्पाद विभाग के आंकड़ों ने इस बदलाव की पुष्टि की है। बिक्री में आई कमी से राज्य के राजस्व पर भी असर पड़ा है। विभागीय आंकड़े इस प्रवृत्ति को स्पष्ट करते हैं। देशी शराब की हिस्सेदारी अब पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। इस बदलाव के कई कारण बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों ने अवैध शराब की ओर बढ़ते रुझान की संभावना भी जताई है। इससे जहरीली शराब की घटनाओं का खतरा बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इस विषय पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। सरकार की उत्पाद नीति भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है।
वित्तीय वर्ष 2020-21 में राज्य में 75.30 लाख एलपीएल देशी शराब की बिक्री हुई थी। वर्ष 2025-26 में यह घटकर 25.78 लाख एलपीएल रह गई। इस अवधि में लगभग 75 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। पहले शराब से मिलने वाले कुल राजस्व में देशी शराब का योगदान 8 से 9 प्रतिशत था। अब यह घटकर लगभग 1.5 प्रतिशत रह गया है। विभागीय आंकड़े लगातार गिरावट का संकेत देते हैं। इससे राजस्व संग्रह भी प्रभावित हुआ है। उत्पाद विभाग इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है। बिक्री के आंकड़ों का लगातार विश्लेषण किया जा रहा है। भविष्य की रणनीति पर भी विचार किया जा सकता है।
जानकारों का कहना है कि उत्पाद नीति 2022 के बाद स्थिति में बड़ा बदलाव आया। पहले देशी शराब प्लास्टिक पाउच में बेची जाती थी। बाद में इसे शीशे की बोतलों में पैक किया जाने लगा। इससे कीमत में वृद्धि हुई। कम कीमत वाली शराब पसंद करने वाले उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव की संभावना जताई जा रही है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार इससे अवैध शराब की ओर रुझान बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में निगरानी और नियंत्रण आवश्यक माना जा रहा है। अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई को और मजबूत करने की जरूरत बताई जा रही है। साथ ही जनजागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इस पूरे विषय पर आगे भी नजर बनी रहेगी।



