प्रकृति ने सबको अपना-अपना हिस्सा दिया है। जंगल कभी हमारे हिस्से में नहीं घुसते, नदी अकारण रिहायशी इलाकों में नहीं बहती, पहाड़ अपनी जगह से नहीं हटते… वो तो हम इंसान हैं जो गिरगिट की तरह रंग बदल देते हैं। हम ही दूसरे के इलाके पर कब्जा करने की नीयत रखते हैं। सड़क के किनारे खड़े पेड़ों की जड़ों पर भी हमने सीमेंट लगा दिया है जिससे धूल उड़कर हमारे सफेद शर्ट को गंदा न करे। फिर हम ही गर्मी, उमस, तपिश, बाढ़, कटान की बातें जोर-जोर से करते हैं। ऐसे जैसे प्रकृति ने हमें धोखा दिया हो। जी नहीं, हमने प्रकृति को छला है। हम सिर्फ नैतिकता और नियमों की बातें करते हैं और अपना फायदा दिखे तो किसी की भी परवाह नहीं करते। बेजुबानों की तो बिल्कुल भी नहीं। उसी का परिणाम है कि पहले दिल्ली में यमुना का रौद्र रूप दिखा और अब गाजियाबाद-नोएडा में उसकी ‘सहेली’ हिंडन के तेवर झेलने पड़ रहे हैं। आम आदमी ही नहीं, शासन-प्रशासन में भी हड़कंप मचा हुआ है क्योंकि हजारों लोगों की जान पर बन आई है। पर क्या 72 घंटे पहले किसी ने सोचा था कि नोएडा एक्सटेंशन में चार मूर्ति से पहले दोनों तरफ पनपते जा रहे घर किसके हैं? क्यों हैं? कोरोना काल से ठीक पहले यानी 2018-19 के बाद हिंडन के डूब क्षेत्र में कॉलोनियां तेजी से क्यों बसती गईं। बेफिक्र हैं लोग, सरकार क्या बुलडोजर चलवाएगी?
लोगों ने अपने-अपने जुगाड़ से घर बनाए हैं। कुछ ने पहले छप्पर रखे फिर पक्का कर लिया। आते-जाते किसी से पूछिए तो बोलेंगे, ‘आपको क्या लगता है इतने लोगों के घरों पर सरकार बुलडोजर चलवा देगी? हहा हा।’ वे आपका मजाक बनाकर फिक्र को उड़ा देते थे। अब रातों की नींद इन्हीं लोगों की गायब है। प्रशासन को क्या कहिएगा। अब वह भी कुंभकर्णी नींद से जाग गया है। हालांकि पहले भी सोया नहीं था, सोने का नाटक कर रहा था। सड़क के किनारे कुछ फर्नीचर की दुकानें तोड़ी भी गई थीं लेकिन घरों को तोड़ने में वोट बैंक का ऐंगल है।



