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एक आतंकी गुट के आगे कैसे ध्वस्त हो गया दुनिया का टॉप इंटेलिजेंस सिस्टम? हर इजरायली को सोचना होगा

7 अक्टूबर की सुबह दुनिया ने जो देखा, वह हर पहलू से ऐतिहासिक विफलता के रूप में दर्ज हो गया है। इजरायल की यह सोच कि फिलिस्तीनी समूह वह युद्ध कभी नहीं छेड़ेंगे जिसे वो जीत नहीं सकते, फिर से ध्वस्त हो गई। तेल अवीव में फैसला लेने वाला समूह के दोषपूर्ण आचरण की इजरायली नागरिकों ने जितनी भारी कीमत चुकाई है, वो असहनीय और भयावह है। इजरायल का राजनीतिक नेतृत्व विफल रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं। पिछले 10 महीनों में, बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार ने मुख्य रूप से इजरायली समाज को नष्ट करने और सत्ता केंद्रों पर नियंत्रण स्थापित करने के प्रयास पर ध्यान केंद्रित किया है। उस प्रयास में उसने एक असफल सुधार पर जोर दिया है जिसने इजरायली नागरिकों के विभिन्न वर्गों में गुस्से की एक मजबूत दीवार खड़ी कर दी है।

नेतन्याहू और उनके सहयोगी राष्ट्र-निर्माण के बजाय यहूदी एंटरप्राइज को नष्ट करने में व्यस्त रहे। इजरायली की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के बजाय उन्होंने सैनिकों, पायलटों समेत सभी को भी नीचा दिखाया जो नेतन्याहू सरकार के लोकतंत्र विरोधी एजेंडे से सहमत नहीं हुए। किसी देश और सेना की प्रतिरोधक शक्ति कोई वैज्ञानिक मामला नहीं है। यह ठीक-ठीक आकलन करना कठिन है कि किसी खास वक्त में इजरायल के दुश्मन कितने डरे हुए हैं। उन्हें मध्य पूर्व की सबसे मजबूत सेना से कितना डर है। कहा जाता है कि प्रतिरोधक क्षमता दुश्मनों के बीच खौफ पैदा करके ही हासिल की जा सकती है। यानी, दुश्मनों को पता होना चाहिए कि इजरायली डिफेंस फोर्सेज और उसके सिक्यॉरिटी सिस्टम से खिलवाड़ करना मूर्खतापूर्ण है।

हालांकि, यह क्षमता वह राजनीतिक नेतृत्व से भी हासिल होती है जो देश के प्रति वफादारी का भाव पैदा करने और देशवासियों को एकता के सूत्र में बांधने के लिए सभी वर्गों को एक मंच पर लाने में सफल हो। इस लिहाज से इजरायल की मौजूदा सरकार पूरी तरह विफल रही है। विशेष रूप से प्रधानमंत्री नेतन्याहू अपनी सरकार में सबसे चरमपंथी तत्वों को नियंत्रित करने में असक्षण साबित हुए। उदाहरण के लिए, जब कोई फिलिस्तीनी बस्ती को जलाने का सुझाव दे तो पीएम की इतनी कुव्व्त होनी चाहिए कि वो उसे फटाकर सकें, उस पर लगाम लगाएं और यहां तक कि उसे बर्खास्त कर सकें।

शनिवार की खूनी घटनाओं पर कई सवालिया निशान लगे हैं। दरअसल, सवालों का अंबार लग गया है- दक्षिणी इजरायल में सैन्य तैयारियों से लेकर धीमी प्रतिक्रिया, फिर इजरायली इंटेलिजेंस सिस्टम की विफलता तक। वास्तव में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है- यह कैसे हुआ कि अपनी सीमाओं के सबसे निकटवर्ती क्षेत्र में तूफानी और समस्याग्रस्त गाजा पट्टी में इजरायली खुफिया एजेंसियों ने कुछ नहीं देखा?

यह कैसे हुआ कि ड्रोन, उपग्रहों, टोही गुब्बारों, कैमरों, जासूसी और गुप्तचरों की सतर्क नजरों से बचकर हमास के आतंकियों ने इजरायल के इतना गहरा जख्म दे दिया? यह कैसे हुए कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ खुफिया एजेंसी आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों का आकलन करने में विफल रहे? शनिवार से ही हर कोई 1973 के यॉम किपुर युद्ध की विफलताओं के बारे में बात कर रहा है। लेकिन यह यॉम किपुर युद्ध जैसी विफलता नहीं है बल्कि यह और भी गंभीर है। यह ऐसी विफलता है जिसे अभी भी समझना और पचाना मुश्किल है।

1973 में खुफिया एजेंसी को सब पता था और लीडरशिप ने भी समय पर फैसला लिया था। यह अलग बात है कि फिर भी नतीजा बहुत भयावह निकला, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि तब कोई खुफिया ही नहीं थी। इजरायल पर शनिवार का हमला इसके ठीक विपरीत है क्योंकि खुफिया जानकारी थी ही नहीं। और जब कोई खुफिया जानकारी नहीं होती है, तो राजनीतिक नेतृत्व निर्णय ले भी तो क्या और कैसे? नेतन्याहू और उनकी राष्ट्रवादी सरकार को कई गलतियों के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, लेकिन वे हर ऑपरेशनल रैंक की तरह इंटेलिजेंस आधारित निर्णय लेते हैं।

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