मॉल्ट स्पिरिट परमिट जारी करने के फैसले को लेकर उत्पादकों के बीच असंतोष देखा जा रहा है। जानकारी के अनुसार मॉल्ट स्पिरिट का उपयोग मुख्य रूप से भारत निर्मित विदेशी शराब के उत्पादन में किया जाता है। इसके बावजूद कुछ देशी शराब निर्माण इकाइयों को भी इसका परमिट दिए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद उद्योग जगत में बहस शुरू हो गई है। कई उत्पादकों ने इस निर्णय पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विभिन्न श्रेणियों की शराब के लिए अलग-अलग उत्पादन प्रक्रिया निर्धारित है। इसलिए परमिट वितरण भी उसी आधार पर होना चाहिए। मामले को लेकर विभाग और उद्योग के बीच मतभेद बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। फिलहाल यह विषय चर्चा के केंद्र में बना हुआ है।
राज्य में 25 डिग्री देशी शराब के निर्माण में एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल का उपयोग किया जाता है। इसके साथ कैरेमल और फ्लेवर जैसे तत्व भी मिलाए जाते हैं। वहीं विदेशी शराब निर्माण में मॉल्ट स्पिरिट का उपयोग किया जाता है। उत्पाद विभाग विदेशी शराब बनाने वाली कंपनियों को इसके लिए परमिट प्रदान करता है। परमिट मिलने के बाद कंपनियां मॉल्ट स्पिरिट की खरीद कर उत्पादन प्रक्रिया में उसका इस्तेमाल करती हैं। दूसरी ओर देशी शराब कंपनियों को ईएनए उपयोग की अनुमति दी जाती है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों प्रकार की शराब के निर्माण में तकनीकी अंतर होता है। इसी वजह से परमिट प्रणाली को लेकर स्पष्ट नियम बनाए गए हैं। वर्तमान विवाद इन्हीं नियमों की व्याख्या को लेकर सामने आया है। मामले पर विभिन्न पक्ष अपनी राय रख रहे हैं।
शराब उत्पादकों का कहना है कि परमिट से जुड़ी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है। उनका मानना है कि इससे उद्योग में संतुलन और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। दूसरी ओर विभाग की ओर से इस विषय पर अभी तक कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। उद्योग जगत इस मामले में स्पष्टीकरण का इंतजार कर रहा है। कई कंपनियां इस फैसले के प्रभाव का अध्ययन कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विवाद बढ़ता है तो नीति स्तर पर चर्चा हो सकती है। यह मामला राज्य के शराब उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में इस विषय पर और तथ्य सामने आ सकते हैं। फिलहाल उत्पादकों के बीच असंतोष और चर्चा का दौर जारी है। स्थिति पर सभी संबंधित पक्षों की नजर बनी हुई है।



