केके पाठक से कभी नीतीश-लालू भी रह चुके हैं परेशान, गोपालगंज में सफाईकर्मी से करवा दिया था अस्पताल का उद्घाटन
देखिए ऐसा नहीं है कि सिर्फ वहीं ईमानदार हैं। बहुत लोग ईमानदार हैं। अपना काम ईमानदारी से करते हैं। फर्क सिर्फ यही है कि ये अपने कार्यालय में बैठकर अन्य अधिकारियों की तरह सिर्फ फरमान जारी नहीं करते। ये एक्शन लेते हैं। खुद फील्ड में जाते हैं। चीजों को जमीन पर होता हुआ देखते हैं। एसी चेंबर से निकलकर जमीनी स्थिति को भांपते हैं। इसलिए इनकी चर्चा ज्यादा होती है। केके पाठक के बारे में ये उपरोक्त विचार हैं, वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र कुमार का। धीरेंद्र साफ कहते हैं कि बिहार के आप बाकी अधिकारियों और विभागों को देख लीजिए। उन्हें अपने चेंबर से निकलने की फुरसत नहीं है। केके पाठक जिस विभाग में रहते हैं। उस विभाग की स्थितियों का परीक्षण जमीन पर रहकर करते हैं। केके पाठक को लेकर सिर्फ धीरेंद्र जैसे पत्रकार ही नहीं, कई शिक्षक भी कुछ ऐसा ही मानते हैं। NBT ऑनलाइन ने केके पाठक को लेकर कई शिक्षकों से बातचीत की। उनकी बातचीत का लब्बोलुआब ये रहा कि ये एक बेहद ईमानदार अधिकारी हैं। इनका शिक्षा विभाग में रहना जरूरी है।
केके पाठक और विवाद
बिहार पर लगातार नजर रखने वाले, कई पुस्तकों के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार केके पाठक को एक प्रतिभाशाली अधिकारी मानते हैं। अभिरंजन कुमार ने एनबीटी ऑनलाइन से बातचीत में कहा कि देखिए सत्य नहीं होता सुपाच्य। उन्होंने कहा कि केके पाठक को लेकर उन्हें कई बातें याद आ रही हैं। 2005 से पहले जब बिहार में लालू-राबड़ी का शासनकाल था। लालू यादव के साले साधु यादव भी सांसद हुआ करते थे। ठीक उसी वक्त गोपालगंज में एक घटना हुई थी। उस घटना के बाद केके पाठक सुर्खियों में आए। हुआ यूं था कि स्थानीय सांसद फंड यानी साधु यादव के सांसद फंड से अस्पताल का निर्माण हुआ। केके पाठक उन दिनों गोपालगंज के जिलाधिकारी थे। केके पाठक ने अस्पताल का उद्घाटन सफाई कर्मचारी से करवा दिया। देखने में भले ये घटना छोटी लगे। केके पाठक ने जो किया। असल में सभी सरकारी भवनों के उद्घाटन और शिलान्यास में यही होना चाहिए। उससे जुड़े कर्मी और कर्मचारी ही उसका उद्घाटन करें। इससे समाज में एक अच्छा संदेश जाता है। लोकसेवक का मतलब यही होता है।
जब गोपालगंज के डीएम थे पाठक
अभिरंजन कुमार बताते हैं कि हालांकि इस घटना के बाद काफी बवाल हुआ। गोपालगंज में डीएम रहते केके पाठक पूरी तरह एक्शन में रहे। सरकार से उनका छत्तीस का आंकड़ा बना रहा। बाद में पाठक को पटना सचिवालय बुलाकर कोई अप्रभावी विभाग दे दिया गया। उन्होंने कहा कि बाद के दिनों में जब नीतीश कुमार की सरकार बनी तो उन्हें बड़ा पद दिया गया। अभिरंजन ने बताया कि नीतीश कुमार हमेशा ईमानदार अधिकारियों को तरजीह देते रहे हैं। उन्होंने केके पाठक को भी दिया। बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण से लेकर शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी पाठक को सौंपी गई। अभिरंजन कहते हैं कि कुछ तो बात है, केके पाठक का नाम देश के 50 असरदार ब्यूरोक्रेट्स में लिया जाता है। वर्ष 2005 में नीतीश सरकार के गठन से पहले की एक घटना बताते हुए अभिरंजन कुमार कहते हैं कि केके पाठक ने उस वक्त भी कड़े कदम उठाए थे। केके पाठक ने गोपालगंज के तत्कालीन सांसद और लालू यादव के साले सुभाष यादव को जिला बदल कर दिया था। आप समझ सकते हैं कि उस वक्त लालू के साले को जिला बदर करना कितनी बड़ी जीवटता और हिम्मत का काम था। इसकी चर्चा पूरे देश में हुई थी। विवाद होने के बाद चुनाव आयोग ने भी केके पाठक के पक्ष में फैसला लिया था। चुनाव परिणाम पर भी इसका असर पड़ा। 2005 के फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन के दौरान केके पाठक का तबादला कर दिया।




