जहां राष्ट्रीय उद्देश्यों का पतन होता दिखाई दे रहा है। मौजूदा हालात में जनरल मुनीर को तीन तरफा विश्वास की कमी का सामना करना पड़ रहा है:सेना, धर्मगुरु और जनता। ये तीनों एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते, लेकिन कोई भी दूसरे पर भरोसा नहीं कर पाता।
जनरल मुनीर की रणनीति पूर्व सैनिक शासक जिया उल हक के मठ-सैन्य गठबंधन की याद दिलाती है, जहां सेना को धार्मिक कट्टरता का समर्थन हासिल होता है। उनके बयान अक्सर कट्टरपंथी विचारधारा और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत पर जोर देते हैं, जो देश की सीमाओं से अधिक उसकी वैचारिक अखंडता की रक्षा करने का प्रयास करते हैं। यह वैचारिक झुकाव आंतरिक विरोधियों को कुचलने और सत्ता को मजबूत करने में मददगार साबित होता है, परंतु यह देश को आर्थिक प्रगति और आधुनिक विकास के मार्ग से भटकाता है।
जनरल मुनीर ने धार्मिक प्रतीकवाद और राष्ट्रवादी भावनाओं के मेल से अपनी पकड़ बनाई है, लेकिन यह नीति देश के लिए दीर्घकालिक समाधान पेश नहीं करती। अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है, और राजनीतिक अस्थिरता चरम पर है। विश्लेषकों का मानना है कि यह दृष्टिकोण पाकिस्तान को 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए तैयार करने के बजाय उसे पिछली सदी की मिथकों में फंसा रहा है, जिससे जनता का भविष्य और भी अंधकारमय होता जा रहा है।


