रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने 25 साल पुराने एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने हत्या के प्रयास और लूट के मामले में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। इसके साथ ही दोषियों की अपील खारिज कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पूरी तरह भरोसेमंद है। उसके बयान में कोई बड़ा विरोधाभास नहीं पाया गया। अदालत ने कहा कि कानून में घायल गवाह की गवाही को खास महत्व दिया जाता है। यह गवाही अक्सर सबसे मजबूत साक्ष्य मानी जाती है। मेडिकल रिपोर्ट भी इस बयान का समर्थन करती है। इसलिए अभियोजन की कहानी पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। इसी आधार पर सजा को बरकरार रखा गया।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने दोनों दोषियों को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि दोनों आरोपी फिलहाल जमानत पर हैं। इसलिए उनकी जमानत तुरंत रद्द की जाती है। उन्हें दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करना होगा। इसके बाद उन्हें शेष सजा काटनी पड़ेगी। अगर वे तय समय में पेश नहीं होते हैं तो गिरफ्तारी की कार्रवाई होगी। यह फैसला न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दिया। अदालत हरिहर ठाकुर और अर्जुन ठाकुर की अपील पर सुनवाई कर रही थी। दोनों ने सत्र न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी।
यह मामला 15 दिसंबर 2000 की शाम का बताया जाता है। उमाकांत साह अपनी नई मोटरसाइकिल से घर लौट रहे थे। त्रिकोणी नदी के पास कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया। आरोप है कि हरिहर ठाकुर के कहने पर अर्जुन ठाकुर ने गोली चलाई। गोली उनकी पीठ में लगी और पेट से निकल गई। इसके बाद आरोपियों ने चाकू से हमला किया। घायल से मोटरसाइकिल छीनकर आरोपी भाग गए। घायल को पहले स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। बाद में बेहतर इलाज के लिए कोलकाता भेजा गया।



