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खुद आंखों से देख नहीं सकते पर सैकड़ों जिंदगियों को रोशन कर रहे रांची के अरुण, जानिए कैसे

झारखंड में रांची के धुर्वा निवासी दृष्टिबाधित शख्स अरुण सफलता का परचम लहरा कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। छात्र जीवन में बीमारी की वजह से अरुण की आंखों की रोशनी चली गई थी। इससे अरुण डिप्रेशन में चले गये थे, पर बाद में अपनी कमजोरी को ही अपनी मजबूती बनाकर उन्होंने ब्रेल लिपि सीखकर दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद रेलवे में नौकरी हासिल की और अब हजारों दिव्यांगों के जीवन में बदलाव ला रहे हैं।

संस्था की मदद से दिव्यांगों को कर रहे सहयोग

दिव्यांगों की मदद करने के लिए अरुण एक संस्था लक्ष्य फॉर डिफरेंटली एबल्ड स्थापित की है, जिसके जरिए वह दृष्टिबाधित लोगों को कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल चलाना सीखा रहे हैं। अब तक सैकड़ों दृष्टिबाधित लोगों को वह कंप्यूटर की ट्रेनिंग दे चुके हैं। इनमें से कई लोग आत्मनिर्भर हो गए हैं। उन्होंने एक ई-लाइब्रेरी भी स्थापित की है, जिसके जरिए दृष्टिबाधित आसानी से पढ़ाई कर रहे हैं। अपने जैसे लोगों का जीवन बेहतर बनाने की उनकी पहल को टाटा स्टील ने भी सराहा है और उन्हें सबल अवार्ड से सम्मानित किया है।

जन्मजात ब्लाइंड नहीं, ग्रेजुएशन में आंखों की रोशनी चली गई

अरुण सिंह बताते हैं कि वे जन्मजात ब्लाइंड नहीं थे। पर उन्हें बचपन से ही आंखों से कम दिखाई देता था। शुरुआत में ही उन्हें ब्लैकबोर्ड और किताबों के छोटे अक्षर पढ़ने में मुश्किलें आती थीं। इसके बाद भी उन्होंने जैसे-तैसे उन्होंने इंटर तक की पढ़ाई पूरी की। बाद में जब वे ग्रेजुएशन में पहुंचे तो उन्हें दिखाई देना बिल्कुल कम हो गया। लिखने-पढ़ने में ज्यादा समस्या होने पर उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी।

रोशनी जाने के बाद अवसाद ने घेर लिया

रोशनी जाने के बाद अरुण को अवसाद ने घेर लिया। उन्हें जीवन में चारों ओर अंधेरा दिखाई देने लगा। पर अरुण ने हिम्मत नहीं हारी। उन्हें पता चला कि कई ऐसी सुविधाएं हैं जिससे दृष्टिहीन पढ़-लिख सकते हैं। इसके बाद उन्होंने ब्रेल लिपि सीखी और दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। जल्द ही अरुण इस नतीजे पर पहुंचे कि हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। उन्हें अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाना होगा।

पांच वर्षों से रेलवे में कर रहे हैं नौकरी

दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद अरुण ने रेलवे की ओर से आयोजित होने वाली प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करनी शुरू की। जल्द की रेलवे में नौकरी पाने में सफल हो गये। पांच वर्षों से अधिक समय से वे रेलवे में नौकरी कर रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर सफलता हासिल करने के बाद अरुण खुश तो थे लेकिन उनके दिल में अपने जैसे लोगों की मदद करने का ख्याल शोर मचा रहा था। अरुण ने अपने दिल की सुनी और फिर अपनी संस्था बनायी, जिसका नाम है लक्ष्य फॉर डिफरेंटली एबल्ड। इस संस्था का लक्ष्य है दिव्यांगों की मदद करना। इस संस्था के जरिये उन्होंने दृष्टिहीनों का जीवन आसान बनाने वाले उपकरणों तथा शिक्षा-दीक्षा में प्रयोग आने वाली चीजों की जानकारी देनी शुरू कर दी। वे दृष्टिहीनों को कंप्यूटर और व्हाट्सऐप चलाना सिखाने के साथ उन्हें ई मेल और फेसबुक चलाने की शिक्षा देने लगे। बाद में उन्होंने दिव्यांगों को ब्लाइंड क्रिकेट और चेस प्रतियोगिता से भी जोड़ना शुरू किया। अरुण की ये पहल रंग लायी और धीरे-धीरे दिव्यांग उनकी संस्था से जुड़ते चले गये। इसके बाद उन्होंने संस्था के जरिये ई लाइब्रेरी की स्थापना की।

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