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‘चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है’, नीतीश ने लिखी नई सियासी स्क्रिप्ट, तेजस्वी और लालू कन्फ्यूज्ड, जानें पूरी बात

राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह के साथ आज जो कुछ हुआ वह अप्रत्याशित तो नहीं था। कुछ इसी तरह से आरसीपी सिंह, शरद यादव या फिर समता से जनता दल तक के आधार बने जॉर्ज फर्नांडिस को भी अध्यक्ष पद से विदाई दी गई थी। आज ललन सिंह की विदाई भी उसी पुराने पथ से हुई जिसकी रूपरेखा नीतीश कुमार तय करते रहे हैं। सियासी जानकारों के मुताबिक नीतीश कुमार के पूर्व के फैसलों को विस्तार से देखें तो पता चलता है कि उनका फैसला कुछ इसी तरह का होता है। नीतीश कुमार को जब कुछ बातों के बारे में पता चलता है या फिर उन्हें लगता है कि बाजी हाथ से जा सकती है, तब कुछ ऐसे फैसले लेते हैं। उनके फैसलों से भले सियासी गलियारे में चर्चा शुरू हो जाए। उनका पूर्व का ट्रैक रिकॉर्ड कुछ ऐसी ही कहानी कहता है।

जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार

यह वर्ष 1994 का रहा था। जब नीतीश कुमार ने जनता दल से अपनी राह अलग कर ली। तब उन्हें जॉर्ज फर्नांडिस का काफी साथ मिला। पहले जनता दल जॉर्ज बना और कुछ महीने बाद समता पार्टी बनी। 1998 में अटल बिहारी सरकार में समता शामिल हुई और नीतीश कुमार केंद्रीय मंत्री बने। 2003 में नीतीश, जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव ने मिलकर जनता दल यू बनाई। जॉर्ज से नीतीश कुमार की नाराजगी तब बढ़ गई जब अरुण जेटली के समझाने पर भाजपा की तरफ से नीतीश कुमार को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट किया गया। तब जॉर्ज ने ये कह कर सबको हतप्रभ कर दिया जब उन्होंने कहा कि हमने पार्टी का नेता तो तय नहीं किया है। लेकिन बाद में समझाने पर जॉर्ज मान तो गए। कहा जाता है नीतीश कुमार ने अच्छे संदेश की तरह नहीं लिया। दोनों नेताओं के बीच खाई बढ़ती गई। फिर आया वो दिन जब वर्ष 2009 में नीतीश कुमार ने खराब सेहत का हवाला देते हुए जॉर्ज को 2009 लोकसभा चुनाव में टिकट ही नहीं दिया। जॉर्ज ने मुजफ्फरपुर से निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। लेकिन नीतीश यहीं नहीं रुके। जॉर्ज को नालंदा से टिकट तो नहीं ही दिया बल्कि उन्हें नीचा दिखाने के लिए उस कौशलेंद्र प्रसाद को टिकट दिया गया, जो कभी जॉर्ज फर्नांडिस का बैग उठाते थे।

शरद यादव और नीतीश

जॉर्ज फर्नांडिस के बाद शरद यादव दुसरे नामचीन नेता थे उन्हें बड़ी बारीकी से जदयू की राजनीति से बाहर किया गया। कहानी यह थी कि 2003 में शरद यादव ने अपनी पार्टी का विलय जेडीयू में कर लिया था। तब से शरद यादव 2016 तक पार्टी के अध्यक्ष रहे। लेकिन दोनों नेताओं में तकरार तो 2013 से ही शुरू हो गया था। कारण बना नरेंद्र मोदी को एनडीए के प्लेटफार्म से पीएम का उम्मीदवार घोषित करना। नाराज नीतीश ने एनडीए से नाता तोड़ लिया। मजबूरन शरद यादव को एनडीए संयोजक पद से त्यागपत्र देना पड़ा। दरअसल, शरद यादव को एनडीए का साथ छोड़ना पसंद नहीं आया। लेकिन फिर जब 2017 में नीतीश कुमार वापस बीजेपी के साथ चले गए तो शरद यादव को यह बात बिल्कुल भी पसंद नहीं आई और उन्होंने नीतीश कुमार के विरोध मोर्चा खोल दिया। नाराज नीतीश ने शरद यादव के साथ अली अनवर को भी पार्टी से निकाल दिया।

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