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शादीशुदा महिला, 26 हफ्ते का गर्भ और लंबी बहस…भारत में गर्भपात को लेकर क्या कहता है कानून

सुप्रीम कोर्ट में अबॉर्शन (Medical Termination of Pregnancy) की मांग को लेकर एक दिलचस्प केस आया था। शादीशुदा महिला 2 बच्चों की मां है और 24 हफ्ते की गर्भवती। नॉर्मल प्रेग्नेंसी है यानी भ्रूण में कोई दिक्कत नहीं है, ऐसी कोई बात नहीं है जिससे महिला के जान पर भी बन आए। अनचाही प्रेग्नगेंसी नहीं बल्कि स्वैच्छिक है। लेकिन महिला और उसका पति अब गर्भ गिराना चाहते थे। शीर्ष अदालत ने पूछा कि 24 हफ्ते की प्रेग्नेंसी के बाद अचानक अब अबॉर्शन की बात क्यों? महिला के वकील ने बताया कि उनके मुवक्किल को पता ही देर से चला कि वह गर्भवती हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई कि शादीशुदा महिला, वो भी 2 बच्चों की मां और 5 महीने तक पीरियड रुका रहा, फिर भी वह नोटिस नहीं की। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर इसकी इजाजत दे दी जाती है तब तो भानुमति का पिटारा ही खुल जाएगा। कोई कभी भी अबॉर्शन के लिए अदालत आ जाएगा कि ये कारण है, वो कारण है, अब बच्चा नहीं चाहते। याचिकाकर्ता ने ये भी दलील दी कि रेप के जुड़े कई मामलों में अदालत अबॉर्शन की इजाजत दे चुकी है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेप से जुड़े मामले अलग हैं। बाद में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने दिल्ली एम्स के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर अबॉर्शन की इजाजत भी दे दी। अगले ही दिन सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच ने उस पर रोक लगा दी। मेडिकल बोर्ड से फिर रिपोर्ट देने को कहा गया। मामला फिर उसी बेंच के पास पहुंचा। बेंच की दोनों महिला जजों ने बंटा हुआ फैसला दिया जिससे फिर केस बड़ी बेंच के पास पहुंचा। कभी हां, कभी ना और लंबी सुनवाई के बीच प्रेग्नेंसी 26 हफ्ते की हो गई। अब सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर को आखिरकार महिला की याचिका खारिज करते हुए कहा कि भ्रूण स्वस्थ और नॉर्मल है, अबॉर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती। आखिर भारत में गर्भपात को लेकर क्या नियम हैं? देश में यह गैरकानूनी तो नहीं है लेकिन कब इसकी इजाजत मिल सकती है, कब नहीं? इसे लेकर कब कानून बने और कब-कब अहम बदलाव हुए? कब-कब अदालतों ने इसे लेकर अहम आदेश दिए? बाकी देशों में इसे लेकर क्या नियम हैं? आइए समझते हैं।

अनचाहा गर्भ नहीं बल्कि स्वैच्छिक और नॉर्मल प्रेग्नेंसी, फिर भी अबॉर्शन की मांग!
सबसे पहले एक नजर डालते हैं सुप्रीम कोर्ट में आए हालिया मामले पर। दिल्ली की रहने वाली दो बच्चों की मां महिला ने प्रेग्नेंसी के 24 हफ्ते बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अबॉर्शन की इजाजत देने की मांग की है। 5 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान जस्टिस हिमा कोहली और बी. वी. नागरत्ना की बेंच ने कहा कि कपल अगर बच्चा नहीं चाहता था तो उन्हें गर्भनिरोधक उपाय अपनाने चाहिए थे। बेंच ने ये भी कहा कि ये कहा गया है कि कोर्ट ने रेप से जुड़ी प्रेग्नेंसी के मामलों में अबॉर्शन की इजाजत दी है लेकिन इस तरह के आदेश शादीशुदा जोड़े के स्वैच्छिक गर्भधारण के मामलों में नहीं दिए जा सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हम जिंदगी के बारे में बात कर रहे हैं। ये स्वैच्छिक प्रेग्नेंसी थी और अचानक आप सोचने लगे कि अब आपको बच्चा नहीं चाहिए।’ कोर्ट ने ये भी कहा कि कपल को 6 महीने तक का इंतजार नहीं करना चाहिए था।

ऐसे तो खुल जाएगा भानुमति का पिटारा: सुप्रीम कोर्ट
दिल्ली की रहने वाली महिला की तरफ से पेश हुए वकील ने शीर्ष अदालत से कहा कि कपल को प्रेग्नेंसी के बारे में बहुत देर से पता चला, यही वजह है कि गर्भपात की इजाजत मांगने में देरी हुई। लेकिन बेंच ने इस दलील को ठुकराते हुए कहा, ‘एक शादीशुदा महिला जिसके 2 बच्चे हैं, उसका पीरियड नहीं आता है और उसे ध्यान भी नहीं रहता कि कुछ गड़बड़ है? महिला को ये महसूस तक नहीं हुआ कि 5 महीने तक उसका पीरियड नहीं आया है! कानून, राज्य और उस जिंदगी (भ्रूण) के प्रति हमारे दायित्व हैं। वह और उसके पति ने वैसे उपाय क्यों नहीं किए जिससे गर्भ न ठहरे? अगर इसे इजाजत दी गई तो इससे भानुमति का पिटारा खुल जाएगा। ऐसे शादीशुदा जोड़े जो किसी न किसी वजह से बच्चे नहीं चाहते वे अबॉर्शन के लिए कोर्ट की दौड़ लगाने लगेंगे।’ याचिकाकर्ता के वकील ने शीर्ष अदालत में कहा कि महिला अपने दूसरे बच्चे के जन्म के बाद से ही डिप्रेशन का शिकार है, इसलिए वह गर्भपात कराना चाहती हैं। डिप्रेशन की वजह से वह तीसरे बच्चे की देखभाल नहीं कर पाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने उसे दिल्ली एम्स के मेडिकल बोर्ड से जांच कराने और 6 अक्टूबर को बोर्ड के सामने पेश होने का निर्देश दिया।

हां-ना के बाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी गर्भपात की इजाजत
मामले में अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को हुई। जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस बी. वी. नागरत्ना की बेंच ने एम्स के डॉक्टरों के बोर्ड की रिपोर्ट के बाद अबॉर्शन की इजाजत दे दी। दिल्ली एम्स में महिला के गर्भ का मेडिकल टर्मिनेशन होता उससे पहले ही सीजेआई की अध्यक्षता वाली एक अन्य बेंच ने अबॉर्शन पर रोक लगा दी। दरअसल अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ के सामने इस केस का जिक्र करते हुए कहा कि अबॉर्शन की प्रक्रिया के दौरान बच्चे के जिंदा जन्म लेने की भी संभावना है और तब उसमें जन्म से जुड़ी विकृति की भी आशंका रहेगी। सीजेआई ने अबॉर्शन को स्थगित करने का आदेश दते हुए मेडिकल बोर्ड को फिर से रिपोर्ट देने को कहा। मामा फिर जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस बी. वी. नागरत्ना की बेंच में गया। दोनों महिला जजों ने बंटा हुआ आदेश दिया। इसके बाद मामला सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच में पहुंचा। बेंच ने सोमवार (16 अक्टूबर) को फैसला दिया कि प्रेग्नेंसी से मां की जान को कोई खतरा नहीं है और न ही भ्रूण में किसी तरह की कोई विकृति है लिहाजा 26 हफ्ते के गर्भ को गिराने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

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