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बच्चों को दूध की जगह पानी में चीनी मिलाकर दे रही… परमीना के घर पर चला बुलडोजर, अब सड़क पर कट रहे दिन-रात

जब मेरा 18 महीने का बेटा दूध के लिए रोता है तो उसे पानी में चीनी मिलाकर देने पड़ती है। मेरा 5 साल का बड़ा बेटा उमस भरे मौसम में तप रहा है, वो पूछता रहता है कि हम पंखा चलाकर कब सो पाएगा। तो मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं होता। यह कहानी है 28 वर्षीय परमीना की जिसके घर को नूंह हिंसा के बाद बुलडोजर से ढहा दिया गया। आज उसका पूरा परिवार सड़कों पर है।

परमीना और उनका परिवार शनिवार को नलहर में अरावली की तलहटी में स्थित उनके घर के ढह जाने के बाद से सड़कों पर हैं। नूंह में 31 जुलाई की सांप्रदायिक हिंसा में कथित तौर पर शामिल लोगों से जुड़ी संपत्तियों के खिलाफ उठाए गए विध्वंस अभियान में वह गाड़ी भी जब्त कर ली गई, जिसमें उनके पति मक्की बेचते थे। परमीना और उसकी दादी सास फाजरी (80) के पास घर से दो लकड़ी के बिस्तर और एक चारपाई खींचने का समय ही था। तभी बुलडोजर आ गए और उसके घर को गिराना शुरू कर दिया। वे अब खंडहरों के बीच रहते हैं और अब खाटों पर सोते हैं।

‘गरीबी का कोई धर्म नहीं होता’
परमीना ने बताया कि मैं खाने के बिना रह सकता हूं, लेकिन जब भोजन सीमित हो तो बच्चों के लिए यह मुश्किल है। मेरे बेटे जीशान और अयान सुबह 6 बजे उठते हैं। सबसे पहले उन्हें दूध चाहिए होता है। हमारा एक बड़ा परिवार है, इसलिए जब तक मेरे ससुर दिन में दूध की व्यवस्था नहीं कर लेते, तब तक मैं उन्हें पानी में चीनी मिलाकर देती हूं। वहीं मलबे के बीच रखी चारपाई पर बैठी फ़ाज़री कहती हैं कि वह लगभग तीन दशकों तक इस घर में रहीं और उन्हें कभी भी निर्माण के अवैध होने की सूचना नहीं मिली। उसने कहा कि गरीबी का कोई धर्म नहीं होता। जिस रात हम बेघर हो गए, उस रात बारिश हुई। इसलिए, हमने जमीन पर मिले पॉलिथीन बैग से अपना सिर ढक लिया। गरीबों के लिए अपने जीवन का पुनर्निर्माण करना कठिन है।

‘घर गिराने थे तो बिजली के मीटर क्यों दिए’
फाजरी के बेटा आस मोहम्मद सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करता है। उसका कहना है कि उनके पास बिजली का मीटर लगा हुआ था और उन्हें प्रशासन से कभी कोई नोटिस नहीं मिला। यह घर 1996 में बनाया गया था। यदि निर्माण अवैध था तो सबसे पहले हमें मीटर क्यों दिया गया। हमें घर को गिराने को लेकर कोई पूर्व सूचना भी नहीं दी गई। वे शनिवार शाम 4 बजे आए और घर पर बुलडोजर चला दिया। मेरे परिवार के कुछ लोगों ने नूंह में एक रिश्तेदार के घर में शरण ली है, लेकिन मेरी मां वहां से जाना नहीं चाहतीं। आस मोहम्मद के छोटे भाई जिसका दो बेडरूम का घर उनके ठीक सामने है जो बच गया। लेकिन यह इतना बड़ा नहीं है कि हर कोई इसमें रह सके।

कहानी राबिया की
राबिया जिसका सड़क के ठीक नीचे स्थित घर भी ढहा दिया गया था, वह भी अपने पांच बच्चों के साथ सड़क पर रह रही है। उसने बताया कि उसका सबसे छोटा बेटा सात साल का है। मेरे पति ट्रक ड्राइवर के रूप में काम करते हैं और अभी तमिलनाडु में कहीं हैं। जब विध्वंस हुआ, तो मुझे खुद ही सबकुछ संभालना पड़ा और अपने रिश्तेदारों के घर में रहना पड़ा। यह पूछे जाने पर कि वह आगे क्या करेगी, राबिया कहती है कि किसी और के घर में रहना मुश्किल है। मैं लंबे समय तक नूंह में रहr हूं। मेरी यहां से जाने की कोई योजना नहीं है।

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