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पार्टनर कमाई में सक्षम तब भी मिलेगा गुजारा भत्ता? जानिए मैंटिनेंस पर नियम से लेकर ऐतिहासिक फैसले तक

पति-पत्नी में अलगाव के बाद अक्सर गुजारा भत्ता के लिए अदालती जंग चलती है। कुछ मामलों में पति अपनी कमाई छिपाकर कोर्ट की तरफ से तय गुजारा भत्ता देने में आनाकानी करता है तो कुछ मामले ऐसे भी आते हैं जब ठीक-ठाक कमाई करने की स्थिति में होने के बावजूद पार्टनर कुछ करना नहीं चाहता या चाहती। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में फैसला दिया है कि अगर पार्टनर कमाई करने में सक्षम है तो दूसरे पार्टनर पर मैंटिनेंस का बोझ नहीं डाला जा सकता। इतना ही नहीं, कोर्ट ने कहा कि शादी से जुड़े कानून में मैंटिनेंस के नियम जेंडर न्यूट्रल हैं यानी दोनों पार्टनर में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हो सकता। ‘हक की बात’ (Haq Ki Baat) सीरीज के इस अंक में बात करते हैं दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले समेत मैंटिनेंस को लेकर समय-समय पर अदालतों की तरफ से दिए ऐतिहासिक फैसलों की। साथ ही जानते हैं मैंटिनेंस को लेकर नियम और कानूनों को।

कमाई में सक्षम तो पार्टनर पर नहीं डाल सकते मैंटिनेंस का बोझ : दिल्ली हाई कोर्ट
सबसे पहले बात दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले की। मैंटिनेंस से जुड़े एक मामले में कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई पार्टनर कमाई करने में सक्षम है तो दूसरे पार्टनर पर मैंटिनेंस का बोझ नहीं डाला जा सकता। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि 1955 के हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत मैंटिनेंस को लेकर जो प्रावधान हैं, वे पूरी तरह से जेंडर न्यूट्रल हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पार्टनर बिना कोई वाजिब वजह के बेरोजगार रहने का फैसला करता है तो दूसरे पार्टनर पर खर्च चलाने के लिए मैंटिनेंस का एकतरफा बोझ नहीं डाला जा सकता। इस मामले में एक शख्स ने फैमिली कोर्ट के अप्रैल 2022 के एक फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसे अपनी पत्नी को हर महीने 30 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने और कानूनी खर्च की भरपाई के लिए अलग से एकमुश्त 51 हजार रुपये देने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने शख्स को राहत देते हुए मैंटिनेंस की रकम को 30 हजार रुपये महीने से घटाकर 21 हजार रुपये कर दिया। कोर्ट ने इस दौरान टिप्पणी की कि पत्नी कमाई करने में सक्षम है लेकिन उसने बिना किसी वाजिब कारण के बेरोजगार बना रहना चुना। ऐसा कोई संकेत नहीं है कि उसने रोजगार हासिल करने के लिए अपनी तरफ से ईमानदार कोशिश की हो। ऐसे में खर्चों की पूर्ति की सारी जिम्मेदारी एकतरफा तरीके से पति पर नहीं डाली जा सकती।

मैंटिनेंस के नियम
अब बात मैंटिनेंस से जुड़े नियम-कानून की। CRPC (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की व्यवस्था की गई है। इसके तहत पत्नी, बच्चे या माता-पिता सरीखे आश्रित तब मैंटिनेंस का दावा कर सकते हैं जब उनके पास आजीविका का कोई अन्य साधन उपलब्ध नहीं हो।

गुजारा भत्ता के दो प्रकार हैं- अंतरिम और स्थायी। अगर मामला अदालत में लंबित है तो उस दौरान के लिए जो गुजारा भत्ता तय किया जाता है, वह अंतरिम गुजारा भत्ता होता है। कोई व्यक्ति पर्मानेंट मैंटिनेंस के लिए भी दावा कर सकता है। तलाक जैसे मामलों में स्थायी गुजाराभत्ता का आदेश तबतक लागू रहता है जबतक कि संबंधित पक्ष (पति या पत्नी) दोबारा शादी न कर ले या उनमें से किसी एक की मौत न हो जाए।

हिंदू मैरिज ऐक्ट, 1955 के तहत पति या पत्नी गुजारा भत्ते का दावा कर सकते हैं। कानून पूरी तरह जेंडर न्यूट्रल है। इसकी धारा 24 कहती है कि अगर पति या पत्नी के पास अपना गुजारा करने के लिए आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है तो वे इसके तहत पार्टनर से अंतरिम गुजारा भत्ता और इस प्रक्रिया में लगने वाले खर्च की क्षतिपूर्ति का भी दावा कर सकते हैं। धारा 25 के तहत पार्टनर स्थायी गुजारा भत्ता का दावा कर सकते हैं अगर वे खुद को गुजारा करने में असमर्थ पाते हैं। घरेलू हिंसा कानून 2005 के तहत भी कोई महिला अपने और बच्चों के लिए गुजारे भत्ते की मांग कर सकती है। हालात के हिसाब से अदालतें गुजारे भत्ते को घटा-बढ़ा या रद भी कर सकती हैं। किसी केस में गुजारा भत्ता कितना होगा, इसका कोई तय फॉर्म्युला नहीं है। यह केस और परिस्थितियों के हिसाब से तय होगा। गुजारे भत्ते की रकम अदालतों के विवेक पर निर्भर है।

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