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क्या पीरियड्स में ऑफिस से छुट्टी मिलनी चाहिए? जान लीजिए इसके पक्ष और विपक्ष के तर्क

महिलाओं को पीरियड के दौरान ऑफिस से छुट्टी मिलनी चाहिए या नहीं, ये मुद्दा आजकल सुर्खियों में है। हाल ही में केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने संसद में एक सवाल के जवाब में कहा कि महिलाओं का मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, न कि किसी तरह की विकलांगता। वैसे महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अनिवार्य तौर पर छुट्टी देने को लेकर काफी समय से बहस चल रही है। स्पेन, जापान, इंग्लैंड समेत कई देशों में महिलाओं को पीरियड के दौरान पेड लीव दी जाती हैं। भारत में भी बिहार में राज्य सरकार की महिला कर्मचारियों के लिए ऐसे ही प्रावधान हैं। आखिर इस मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में क्या दलीलें हैं, आइए ‘आमने-सामने’ में पढ़ते हैं वरिष्ठ साहित्यकार नासिरा शर्मा और लखनऊ यूनिवर्सिटी की पूर्व वाइस चांसलर रूपरेखा वर्मा इस मुद्दे पर क्या सोचती हैं।

नासिरा शर्मा- एकतरफा रवैया मामले को उलझा देगा, व्यावहारिक पहलुओं का ध्यान रखना होगारूपरेखा वर्मा- महिलाओं को बराबरी की जमीन देनी है तो महिला विरोधी नजरिए से लड़ना होगा
जब औरत कंधे से कंधा मिलाकर जीवन के हर कार्यक्षेत्र में बराबर की उपलब्धियां हासिल कर रही हो, तब इस तरह की पाबंदियां उस पर लगाई जा रही हैं कि सोचना पड़ रहा है, कहीं उसकी जैविक संरचना ही उसके काम के आड़े तो नहीं आ रही। बात बहुत मामूली हो सकती थी, लेकिन अहम इसलिए बन गई है कि इसे कहने वालीं हमारी विमिन एंड चाइल्ड डिवलेपमेंट मिनिस्टर हैं। वैसे इस मुद्दे पर गहराई से सोचें तो साफ हो जाता है कि यह समस्या जज्बाती ढंग से या फिर किसी एक नजरिए को निगाह में रख कर हल नहीं हो सकती। इसका समाधान एक गहरा संवाद या लंबी बहस चाहता है।संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को माहवारी की छुट्टी दिए जाने का एक प्रस्ताव संसद में आया, जिस पर सरकारी रुख की चर्चा जरूरी है। केंद्रीय महिला और बाल कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी ने इस प्रस्ताव के विपक्ष में अपना मत रखा। जो तर्क केंद्रीय मंत्री ने दिए, उन पर विचार करने की आवश्यकता है।
जैविक संरचना: जब से औरत वजूद में आई, तब से उसकी जैविक संरचना का ज्ञान सभी को है। उसने अपनी बनावट के अनुसार हर दौर में अपने कर्तव्य का पालन किया है। चाहे वह गांव की औरत हो या अंतरिक्ष में जाने वाली कल्पना चावला जैसी महिलाएं। बच्चे की पैदाइश और मेंसेस (माहवारी) के दिनों में भले ही उसे कुछ काम न करने की हिदायत रही हो। हालांकि ये कथित हिदायतें समय के साथ बदलती भी रहीं। कुछ मेडिकल सहूलियतों की बदौलत, कुछ जड़ सोच के बदलने से।दो मुख्य बिंदु: प्रस्ताव को अस्वीकृत करते हुए जो कहा गया, उसमें दो बिंदु मुख्य हैं। एक यह कि माहवारी कोई बीमारी या बाधा नहीं है कि उसके कारण विशेष अवकाश का प्रावधान हो। दूसरा बिंदु है कि इस तरह के अवकाश का प्रावधान महिलाओं को ही नुकसान पहुंचाएगा क्योंकि ज्यादा अवकाश की दावेदार महिलाओं को लोग नौकरियों पर नहीं रखेंगे।
बातचीत और समाधान: इस समय जो मांग आ रही है, पीरियड के दौरान मिलने वाली छुट्टियों की है। कुछ इसे जागरूकता कहेंगे, कुछ अधिकार तो कुछ इसे बेजा मांग। याद रखना चाहिए, माहवारी के वक्त हर महिला को इस तरह की तकलीफ नहीं होती है कि उसे आराम करने की जरूरत पड़े। यह कुछ ही औरतों की समस्या है, जो हल की जा सकती है। स्टाफ और बॉस के बीच बातचीत के जरिए कोई ऐसा समाधान निकाला जा सकता है, जो मानवीय हो और व्यावहारिक भी।बीमारी नहीं, बाधा तो है : यह बात सही है कि माहवारी कोई बीमारी या विकलांगता नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह किसी प्रकार की बाधा नहीं है। शरीर की इस अवस्था में कई तरह की परेशानियां महिलाओं को होना आम बात है। सभी महिलाओं को नहीं, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं को तेज दर्द, थकान और कुछ को अवसाद भी रहता है जिसके कारण वे आम दिनों की तरह काम नहीं कर सकतीं।सुविधाओं की कमी : इन शारीरिक तथ्यों के अलावा दफ्तरों, शिक्षा संस्थानों और अन्य कार्य स्थलों पर प्रसाधन स्थलों का प्रबंध और रखरखाव, बावजूद बेहतर योजनाओं के असलियत में इतना खराब है कि इस विशेष स्थिति में महिलाओं की दिक्कतें चौगुनी हो जाती हैं। विशेष अवकाश की मांग रद्द करने के साथ अगर मंत्री महोदया कम से कम इन व्यावहारिक और जमीनी सचाइयों पर गौर कर लेतीं और उन्हें ठीक करने का आश्वासन देतीं तो यह सही दिशा में उठाया गया कदम होता। यह नहीं हुआ। हालांकि होता तो भी समस्या का पूरा समाधान न मिलता और उनका तर्क फिर भी गलत ही होता।

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