महिलाओं के लिए वरदान या परिवार टूटने के लिए दुरुपयोग का माध्यम
लोकप्रिय चैनल बाँवरे छोरे, जो दो भाई मिलकर चलाते हैं और वह दोनों भाई गौमाता की सेवा करते हुए अपने वीडियो अपलोड करते हैं। उनके वीडियो ऐसे होते हैं कि देखकर हंसी आ जाती है। झुमर, नंदू और न जाने कितनी गैयों की शरारतें वह लोग अपलोड करते हैं। वह भारत की उस आत्मा के वीडियो पोस्ट करते हैं, जिनके माध्यम से न जाने कितने लोग वह सपना जीते हैं, जो सपना उनके दिल में ही रह जाता है। चूंकि भारत का एक बड़ा वर्ग अभी भी वही जीवन जीना चाहता है, जिसमें गाय, बछड़े आदि सभी हों, इसलिए लोग उनसे जुड़े हैं।
और हमारे ग्रंथों में भी गौ सेवा को बहुत बड़ी सेवा बताया गया है। उनके वीडियो में उनके घरवाले भी दिखते हैं, जैसे उनकी माँ और पिता। एक बेहद साधारण परिवार, जिसकी सीमा अपनी गाय, बछड़ा और वह सभी हैं। परन्तु दो दिन पहले उनका एक वीडियो ऐसा आया जिसने उनके प्रशंसको को हिलाकर रख दिया। वह वीडियो ऐसा था कि जिस पर कोई विश्वास भी नहीं कर सका। वह वीडियो था उस क़ानून के विषय में जिसके विषय में न्यायालय से भी बार-बार टिप्पणियाँ आती रहती हैं कि वह क़ानून पुरुषों को फंसाने का माध्यम बना जा रहा है।
जिसे लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी वर्ष 2005 में सुशील कुमार बनाम युनियन ऑफ इंडिया मामले में लीगल टेररिज़म या कानूनी आतंकवाद की संज्ञा दी थी। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2022 में यह स्पष्ट कहा कि 498ए के मामले में पति के रिश्तेदारों के विरुद्ध स्पष्ट आरोप के बिना केस चलाना कानूनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग है।



