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प्रचंड को नेपाल का पीएम बनाने वाले सरदार प्रीतम सिंह कौन हैं, जानिए जम्‍मू से काठमांडू गए इस ट्रांसपोर्ट किंग की कहानी

सरदार प्रीतम सिंह, नेपाल का वह बिजनेसमैन, जो भारतीय है लेकिन इस समय काफी खबरों में हैं। पिछले दिनों नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्‍प कमल दहल प्रचंड ने यह बात स्‍वीकार की कि एक भारतीय बिजनेसमैन ने उन्‍हें देश का पीएम बनाने की काफी कोशिशें की। प्रचंड के इस बयान के बाद प्रीतम सिंह भी काफी सुर्खियों में हैं। प्रीतम सिंह को नेपाल का ट्रांसपोर्ट किंग कहा जाता है। अखबार द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2014 में जब उनकी बड़ी बेटी ग्‍यानू को कैंसर हुआ तो प्रचंड उनके इलाज के लिए भारत आए थे। इस दौरान वह प्रीतम सिंह के घर पर ही रुके थे। प्रीतम सिंह ने उसी समय प्रचंड से कहा था कि वह उन्‍हें एक दिन नेपाल का पीएम बनाने में मदद करेंगे।

1959 में पहुंचे थे नेपाल
प्रचंड साल 2008 से 2009 तक नेपाल के पीएम थे। देश में बढ़ते राजनीतिक संकट के चलते उन्‍हें इस्‍तीफा देना पड़ गया था। इसके बाद उन्‍होंने कई बार कोशिशें की कि देश के पीएम बन जाएं लेकिन हर बार असफल रहे। इसके बाद साल 2016 में और फिर दिसंबर 2022 में वह नेपाल के पीएम बने। हर कोई जानना चाहता है कि आखिर प्रीतम सिंह कौन हैं। सरदार प्रींतम सिंह की कहानी जनवरी 1959 से शुरू होती है। प्रीतम सिंह की बेटी किरण दीप संधू ने अपनी किताब ‘रोड्स टू द वैली’ को पिछले दिनों लॉन्‍च किया है। इस किताब में उन्‍होंने अपने पिता के जीवन के बारे में बताया है। प्रचंड ने ही इस किताब को लॉन्‍च किया था।जम्‍मू से पहुंचे नेपाल
इसी किताब में किरण ने लिखा है कि 24 साल के प्रीतम सिंह जो जम्‍मू कश्‍मीर के रहने वाले थे, उनका मकसद नेपाल में ट्रांसपोर्ट का बिजनेस शुरू करना था। इसी मकसद से वह जम्‍मू से बिहार और फिर नेपाल पहुंचे। उनके पास तीन जीएमसी ट्रक थे और उसके साथ तीन दोस्त भी थे। एक सदी तक नेपाल वह धरती थी जहां पर भारतीय व्‍यापार नहीं कर सकते थे। साल 1950 में शांति और मित्रता की संधि के साथ इसे भारतीय व्यापारी वर्ग के लिए खोला गया था। इसके बाद भारतीय भी काठमांडू में व्यापार करने के लिए जाने लगे। अगर किसी को भी यह पता लग गया होता कि वह रेल पटरियों की मदद से ट्रकों को नेपाल लेकर जा रहे हैं तो उनका सपना टूट जाता। साथ ही उनकी जिंदगी जेल में बीत जाती। कई रातों तक ट्रकों को फ्लैंग्‍ड व्‍हील की मदद से रेलवे पटरियों पर चलाकर प्रीतम सिंह नेपाल ले आए। तीन ट्रकों को वह रक्सौल से नेपाल लेकर आए थे।

संकट में भी नहीं छोड़ा देश
नेपाल, दक्षिण एशिया की कनेक्टिविटी के युग में प्रवेश कर चुका था। साथ ही सरदार प्रीतम सिंह अपनी साहसी और लीक से हटकर सोच के साथ नेपाल के जीवन में प्रवेश करने को तैयार थे। राजा महेंद्र के शासनकाल से शुरू होकर, सरदार प्रीतम सिंह नेपाल की विकास यात्रा के निरंतर साथी रहे हैं जिसने उन्हें नेपाल के सभी शासकों के निकट संपर्क में लाया। संधू को याद है कि उनके माता-पिता ने एक जून, 2001 को नारायणहिती पैलेस में शाही परिवार के नरसंहार की खबर पर कैसे प्रतिक्रिया दी थी। चिंतित प्रीतम सिंह ने अपनी पत्नी सरदारनी हरचरण कौर से कहा कि वह चाहते हैं कि वह बच्‍चों को लेकर नेपाल से चली जाएं। सड़कों पर हिंसा भड़कने की आशंका थी। लेकिन मां ने यह कहते हुए मना कर दिया, ‘अगर आप हमारे साथ नहीं जा रहे हैं तो हम भी नेपाल में ही रहेंगे।’

घर-घर में मशहूर सरदार प्रीतम सिंह

किरण दीप संधू ने कहा, ‘मेरे पिता लगभग सात दशकों तक नेपाल में रहे हैं और इसलिए कहीं और जाने का सवाल ही नहीं था। साल 1959 में सरदार प्रीतम सिंह जिन जीएमसी ट्रकों को नेपाल में लेकर आए थे उनकी मदद से नेपाल पब्लिक मोटर सर्विस (एनपीएमएस) के मालिक बन गए थे। जब पश्चिमी नेपाल भयानक अकाल की चपेट में आया तो प्रीतम सिंह बड़े मददगार साबित हुए। राजा महेंद्र के अनुरोध पर सरदार प्रीतम सिंह भारत से नेपाल के पहाड़ों के पार भोजन पहुंचाने का चुनौतीपूर्ण कार्य पूरा किया था। अकाल प्रभावित देश की मदद कर सरदार प्रीतम सिंह नेपाल के हर घर में मशहूर हो गए।

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