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महिला आरक्षण में OBC कोटा! 13 वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि यू-टर्न लेने पर मजबूर हो गई कांग्रेस?

सोनिया गांधी ने पिछले हफ्ते लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर बहस के दौरान ओबीसी के लिए सब-कोटा की मांग की। यह सामाजिक न्याय की कांग्रेसी राजनीति का एक हिस्सा है। सोनिया गांधी की संसद में मांग 2010 के कांग्रेस के स्टैंड से बिल्कुल उलट है। उस वर्ष यूपीए-2 की मनमोहन सिंह सरकार ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान वाला विधेयक पेश किया तो मंडलवादी राजनीति करने वाले दलों ने इसमें पिछड़े वर्गों के लिए सब-कोटा निर्धारित करने की मांग की। तब कांग्रेस ने उनका जमकर विरोध किया। उस समय, राज्यसभा ने इसे पारित कर दिया था, लेकिन यह कभी लोकसभा तक नहीं पहुंचा। उस समय, सोनिया गांधी ने पत्रकारों से कहा था, ‘एक बार महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हो जाने के बाद इन दलों को अपनी तरफ से ओबीसी महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारने से कोई नहीं रोकेगा।’

फिर भी, पिछले 13 वर्षों में कांग्रेस ने जिस रास्ते पर चलने का फैसला किया है, उसके मद्देनजर बदले हुए रुख को शायद ही कट्टरपंथी कहा जा सकता है। ऐसा यूपीए-2 के बाद कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक के बिल्कुल बिखराव के बाद से ही हो रहा है। कांग्रेस ने दशकों तक बहुत सोच-समझकर मध्यमार्गी राजनीति का रास्ता अपना रखा था जिसमें यह बदलाव पिछले तीन वर्षों में तेजी से आगे बढ़ा है। यूपीए-2 के सत्ता से बाहर होने के बाद इस पार्टी को उच्च जातियों ने त्याग दिया और भारी संख्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के खेमे में चली गईं। उच्च जातियों के रुख में यह परिवर्तन इतना बड़ा है कि कांग्रेस को राजनीतिक तबाही का सामना करना पड़ा। हालांकि, उसकी तबाही बहुत पहले शुरू हो गई थी- अयोध्या राम मंदिर आंदोलन के साथ बीजेपी के उदय के साथ, लेकिन कांग्रेस के पास मतदाताओं के कुछ जत्थे बचे हुए थे। इस कारण केंद्र की राजनीति पर उसका वर्चस्व कायम रहा था।

2014 के बाद कांग्रेस पार्टी का तेज पतन और पीएम मोदी के नेतृत्व में बीजेपी के लचीलेपन ने ऊपरी जातियों के समर्थन को हिंदुत्व के आसपास मजबूत कर दिया। इससे कांग्रेस के लिए किसी भी तरह की ‘घर वापसी’ या राष्ट्रीय स्तर पर जमीनी मजबूती को एक दूर का सपना बना दिया। इसने पार्टी को अपनी पकड़ वाले क्षेत्र पर पुनर्विचार करने और नई ‘डेमोग्राफिक्स’ की तलाश करने के लिए मजबूर किया, जो पार्टी में जान लौटा सकें। कांग्रेस के पास हमेशा एक ‘आम आदमी’ वाला ब्लूप्रिंट तैयार रहता है- यही वह चीज थी जिसने 2003 में वाजपेयी के नेतृत्व वाले इंडिया शाइनिंग अभियान को आश्चर्यचकित कर दिया था। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते कांग्रेस के शासन के वर्षों में कई लोकलुभावन घोषणाएं हुई थीं।

2014 के बाद कांग्रेस ने इन वादों पर अधिक जोर दिया और इन्हें नया रूप दिया। मध्य प्रदेश में दिसंबर 2018 में कांग्रेस को भाजपा से आगे निकलने में कर्ज माफी के वादे ने मदद की थी। इसी तरह के अन्य वादों ने भी पार्टी को उसी साल छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत दिलाई। इन जरूरी जीत ने कांग्रेस को इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए प्रेरित किया। पार्टी ने ‘पांच गारंटी वाला दृष्टिकोण’ कहकर गरीब वर्गों को लुभाने की कोशिश की।

लेकिन बाद में, पार्टी ने महसूस किया कि क्लास को कास्ट के साथ मिलाकर एक शक्तिशाली राजनीतिक पैकेज बनाएगी, क्योंकि जाति एक जन आंदोलन के उपकरण के रूप में बहुत आकर्षक है। कम से कम हिंदी हार्टलैंड की तो यह सच्चाई है ही। पार्टी के अंदर होनहार ओबीसी नेताओं का मान बढ़ना शुरू हुआ, जिनमें से कुछ नए थे जैसे कि भूपेश बघेल और कुछ पुराने थे जैसे कि अशोक गहलोत और सिद्धारमैया। अब सोनिया और राहुल गांधी ने जाति जनगणना और महिला आरक्षण बिल में ओबीसी सब-कोटा की मांग का समर्थन किया।

अगस्त 2021 में, कांग्रेस ने सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण में बदलाव को लगभग औपचारिक रूप दिया। 127वें संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान संसद में अपने सहयोगियों का नेतृत्व करते हुए कांग्रेस ने आरक्षण की 50% सीमा को हटाने और जाति जनगणना की भी मांग की। इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित किया गया और इसे दोनों दलों का समर्थन प्राप्त हुआ। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को ‘ठीक’ किया, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलने का मतलब है कि राज्यों के पास राज्य सूचियों के लिए ओबीसी की पहचान करने की कोई शक्ति नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देशभर में भाजपा की आलोचना हुई थी। इस विधेयक का केवल समर्थन करने के बजाय, महाराष्ट्र के मुख्य दलों, मंडल संगठनों और कांग्रेस ने दो जटिल मांगें उठाईं, जिससे कांग्रेस को सामाजिक न्याय पार्टियों के साथ खड़ा कर दिया। हालांकि मंडल पॉलिटिक्स ने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया था, लेकिन सोशल जस्टिस की मांग उठाने वाली पार्टियां हमेशा न्यायपालिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से पीड़ित रहीं। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा तय की और जाति जनगणना को हरी झंडी नहीं दी।

इसके विपरीत, कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही इन दूरगामी परिणाम की मांगों से दूर रहा करते थे। उन्हें डर था कि ऐसी नीतियों के बेहद खतरनाक सामाजिक और आर्थिक नतीजे होंगे जिनसे पार पाना कठिन हो जाएगी। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। कांग्रेस पार्टी ने 127वें संविधान संशोधन विधेयक के समय तक आरक्षण पर अपनी आपत्तियां छोड़ दी थीं। उसने धीरे-धीरे लेकिन लगातार मंडल संगठनों के साथ खुद को जोड़ा।

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