I.N.D.I.A. की छतरी के नीचे सर्वसम्मत फार्म्युला आसान नहीं, लोकसभा के साथ विधानसभा सीटों पर भी बनानी होगी सहमति!
झारखंड में वर्ष 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव से ही यूपीए गठबंधन की सरकार चल रही है। इस गठबंधन में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) शामिल है। लेकिन अब लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर देश में एक नया गठबंधन आई.एन.डी.आई.ए. अस्तित्व में आया है। इस गठबंधन में कांग्रेस, जेएमएम और आरजेडी के अलावा कई अन्य दल भी शामिल हैं, जो वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा और झारखंड विधानसभा चुनाव में हिस्सेदारी मांगेंगे। हालांकि मौजूद राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस-जेएमएम-आरजेडी को छोड़ कर अन्य दलों का झारखंड में कोई खास प्रभाव नहीं हैं। लेकिन गठबंधन में शामिल जेडीयू, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और कई वामपंथी दलों की ओर से भी अपनी दावेदारी पेश की जा सकती हैं। ऐसे आई.एन.डी.आई.ए. की छतरी के नीचे सर्वसम्मत फार्म्युला आसान नहीं होगा। जबकि लोकसभा के साथ ही विधानसभा सीटों के बंटवारे पर भी चर्चा जरूर होगी।
जेएमएम-कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान की झलक
राज्य में सरकार का नेतृत्व जेएमएम के हाथों में हैं,जबकि कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी साझीदार है। ऊपर से दोनों दलों के रिश्ते कमोबेश सामान्य दिखते हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर खींचतान कई मौकों पर साफ दिख जाती है। 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर झारखंड सरकार की ओर से रांची के बिरसा मुंडा स्मृति पार्क में दो दिवसीय भव्य और विशाल आयोजन हुआ। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस आयोजन के केंद्र में रहे, जबकि सरकार में शामिल कांग्रेस के तमाम मंत्रियों की इस कार्यक्रम से दूरी रही। दरअसल, 9 अगस्त को कांग्रेस ने सरकार के आयोजन से इतर रांची में बनहौरा नामक जगह पर आदिवासी समागम कार्यक्रम किया। इसमें कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अविनाश पांडेय, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, सरकार में शामिल कांग्रेस के मंत्री बन्ना गुप्ता, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर, कार्यकारी अध्यक्ष बंधु तिर्की सहित कई नेता शामिल रहे।
कई अन्य फैसलों को लेकर भी जेएमएम-कांग्रेस में असहमति
सरकार से अलग कांग्रेस के इस आयोजन को दोनों दलों के बीच किसी मतभेद का नतीजा भले न माना जाए, लेकिन इसके सियासी मायने-मतलब तो हैं ही। इसके पहले भी सरकार के कई फैसलों को लेकर झामुमो और कांग्रेस के बीच असहमति के हालात पैदा होते रहे हैं।
विधानसभा चुनाव के लिए सीटों का बंटवारा चुनौतीपूर्ण
राज्य में आई.एन.डी.आई.ए. के सामने बड़ी चुनौती लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे को लेकर पेश आने वाली है। राज्य के मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन में तीन पार्टियां झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल शामिल हैं। वर्ष 2019 में हुए लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इन तीनों ही पार्टियों ने आपस में सीटों का बंटवारा किया था।
गठबंधन दलों की संख्या तीन से बढ़कर 5 से 6 हो जाएगी
अब नवगठित आई.एन.डी.आई.ए. अगर झारखंड में एक साथ चुनावी मैदान में जाने का संकल्प लेता है तो गठबंधन की छतरी के नीचे आने वाली पार्टियों की संख्या तीन से बढ़कर पांच से छह हो जाएगी। तब सीटों की हिस्सेदारी-दावेदारी का सवाल बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। राज्य के मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और वाम पार्टियों की कोई हिस्सेदारी नहीं है।
जेडीयू और वामदलों की भी होगी दावेदारी
राज्य में फिलहाल जदयू का कोई विधायक नहीं है, जबकि वामपंथी दलों में से सीपीआई-एमएल का मात्र एक विधायक है। नए गठबंधन इंडिया के भीतर जदयू और वाम पार्टियां भी लोकसभा और विधानसभा सीटों पर दावेदारी पेश करेंगी। राज्य में लोकसभा की 14 सीटें हैं, जिनके बंटवारे के लिए इंडिया के घटक दलों के बीच सर्वसम्मत फार्मूला बना पाना बेहद टेढ़ी खीर होगा। 2019 के चुनाव में यहां चार दलों कांग्रेस, जेएमएम, जेवीएम और राजद का गठबंधन बना तो था, लेकिन सीटों के बंटवारे पर भारी जिच हुई थी। गठबंधन के भीतर कांग्रेस को सात, झामुमो को चार, बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा को दो और राष्ट्रीय जनता दल को एक सीट मिली थी।
आरजेडी के कारण चतरा सीट पर नहीं बन पाई थी सहमति
13 सीटों पर एकजुटता कायम रही, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल मात्र एक सीट मिलने से संतुष्ट नहीं था। उसने दो सीटों पलामू और चतरा में अपने उम्मीदवार उतार दिए थे। इस बार आई.एन.डी.आई.ए. गठबंधन में झामुमो, कांग्रेस और राजद के अलावा जदयू और वाम पार्टियां भी लोकसभा सीटों पर दावेदारी करेंगी। इन पार्टियों की अपनी-अपनी बैठकों में सीटों की दावेदारी-हिस्सेदारी को लेकर चर्चा भी शुरू हो गई है।




