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कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना… बीजेपी विरोध के नाम पर राम-कृष्ण और सनातन को घसीट रहे नेता

यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि सपने में वही चीजें दिखती हैं, जो जाग्रत अवस्था में आदमी के जेहन में होती हैं। इन दिनों बिहार के नेता सपने देखने लगे हैं। सपने में वे मंत्री या मुख्यमंत्री बन गए या सांसद-विधायक बने, यह भी देखते होंगे, पर कभी जाहिर नहीं करते। हां, देवी-देवता उनके सपने में आएं तो इसका बखान खूब करते हैं। देवी-देवता सपने में आते हैं या नहीं, पर जिस अंदाज में उन्हें नीचा दिखाने का अजकल प्रचलन बढ़ा है, उसकी अभिव्यक्ति का यह दूसरा माध्यम भी हो सकता है। कभी व्यंग्यात्मक अंदाज में तो कभी सनसनीखेज शैली में। हाल के दिनों में बिहार के कुछ नेताओं के सपने में राम और कृष्ण आने लगे हैं।

शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर के सपने में आए थे राम

बिहार के शिक्षा मंत्री हैं प्रो. चंद्रशेखर, जो अपने विवादित बयानों के लिए मशहूर हो गए हैं। उनकी पार्टी आरजेडी में आलाकमान की ही चलती रही है, लेकिन ये आलाकमान से भी ऊपर उठ गए हैं। पहले वे अपने ज्ञान के आधार पर रामचरित मानस को नफरती ग्रंथ बताते थे। अब तो रामचिरत मानस के नायक राम भी उनके सपने में आकर मदद मांगने लगे हैं। अक्सर आदमी को राम-कृष्ण जैसे आराध्य से लोगों को गुहार लगाते सबने देखा या सुना होगा, लेकिन चंद्रशेखर बताते हैं कि सपने में राम ने ही उनसे मदद की गुहार लगाई। उन्होंने चंद्रशेखर से चिरौरी की कि उन्हें बिकने से बचा लें। बकौल चंद्रशेखर, राम ने उनसे कहा- ‘मुझे कुछ लोग बेचने पर तुले हुए हैं।’ और इसके साथ ही राम को बचाने का चंद्रशेखर ने अभियान छेड़ दिया है।

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नीरज कुमार बबलू के सपने में दिखे थे कृष्ण

चंद्रशेखर ने जब अपने सपने की बात सार्वजनिक कर दी तो उनकी विरोधी पार्टी यानी बीजेपी के नेता भी सच्चाई जानने के लिए सपने में राम की तलाश करने लगे। हालांकि उन्हें राम तो नहीं दिखे, लेकिन कृष्ण जरूर नजर आ गए। भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री नीरज कुमार सिंह बबलू ने कहा कि उनके सपने में तो भगवान कृष्ण ही पहुंच गए थे। भगवान कृष्ण ने सपने में उनसे कहा कि तुम्हारा पड़ोसी चंद्रशेखर पागल हो गया है। कृष्ण ने उनके इलाज का बबलू से आग्रह किया। दरअसल चंद्रशेखर के ही तर्ज पर बबलू का भी बयान था। उन्होंने कहा भी कि जब से चंद्रशेखर मंत्री बने हैं, तब से उनका नाता विवादों से बढ़ गया है। विवादित बयान दिए बिना उनके पेट का खाना नहीं पचता है।

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राम-कृष्ण के साथ बजरंग बली भी हैं मैदान में

आश्चर्य यह कि हिन्दुओं के सारे देवी-देवता अब ऐसे नेताओं को ही दर्शन देते हैं, जिन्हें उनमें बुराई दिखती है तो अच्छाई भी। आम आदमी की नजर में भगवान का दर्जा हासिल कर चुके ये देवता आश्चर्यजनक रूप से इन नेताओं के सामने याचक के रूप में ही प्रकट होते हैं। यानी प्रो. चंद्रशेखर हो या बबलू, उनसे अधिक ताकतवर हो गए हैं। एक से राम अपने को बिकने से बचाने का आग्रह करते हैं तो दूसरे से पड़ोसी के इलाज की याचना करते हैं। बिहार के एक मंत्री तेजप्रताप तो बजरंग बली की चर्चा भी करते हैं। वे कहते हैं कि कर्नाटक में जिस तरह बजरंग बली का नाम भुनाने वालों का हाल बजरंग बली ने किया, उसी तरह का अंजाम बिहार समेत दूसरे राज्यों में भी इनका होगा।

कहीं ये सनातन की खिल्ली तो नहीं उड़ा रहे!

विपक्षी दलों के नेता इन दिनों सनातन के खिलाफ हवा बनाने में जुट गए हैं। तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डीएमके (DMK) ने तो सनातन के खत्मे का संकल्प ही ले लिया है। डीएमके नेता ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ और ‘अहिंसा परमो धर्म’ का संदेश देने वाले सनातन की समाप्ति का कठिन व्रत ले चुके हैं। ऐसा सोचते समय वे भूल जाते हैं कि सैकड़ों साल तक हूण, तुर्क, मुगल, पठान और अंग्रेजों जैसे हमलावर जब सनातन को खत्म नहीं कर पाए तो दूसरों की क्या बिसात है। दरअसल इन्हें भाजपा का विरोध करना है, जो सनातन के सहारे अपनी जड़ें लगातार मजबूत करती रही है और लगातार 9 साल से सत्ता पर काबिज है। दरअसल सनातन का विरोध ये सिर्फ भाजपा को नीचा दिखाने के लिए कर रहे हैं। हालांकि ऐसा करते समय सत्ता का सपना देख रहे ये नेता भूल जाते हैं कि यह उनके लिए भस्मासुर जैसा अंजाम का कारक बन सकता है।

दुर्गा की नंगी पेंटिंग वाले मकबूल पर भी फिदा

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि मकबूल फिदा हुसैन ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में तो अच्छी-अच्छी पेंटिग्स बनाई। कुछ साल तक वे डॉ. लोहिया के संपर्क में भी थे। बाद में उनकी अत्यंत विवादास्पद पेंटिंग्स आने लगीं। यहां तक कि उन्होंने दुर्गा और सरस्वती की नंगी तस्वीरें ‘पेंट’ कर दीं। उस कारण उन पर मुकदमा हुआ। देश में उनके पुतले जलाए गए। कुछ अल्ट्रा सेक्युलर लोगों ने फिदा हुसैन के जन्मदिन (17 सितंबर) पर उन्हें इस साल श्रद्धापूर्वक याद किया। कलात्मक स्वतंत्रता की भी एक सीमा होती है। फिदा हुसैन ने तो उस सीमा को ही लांघ दिया था। मकबूल ने साल 1996 में अपनी गलती के सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी। यहां तक कि मकबूल फिदा हुसैन को जब लगा कि वह अदालत का सामना नहीं कर सकेंगे तो वे साल 2006 में देश छोड़ कर ही भाग गए। क्या मकबूल फिदा हुसैन को श्रद्धापूर्वक याद करने वाले भारतीय बुद्धिजीवी दुर्गा और सरस्वती के उपासकों को अपमानित नहीं करते हैं ?

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