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भारत में चिंगारी लगाने तक का मसाला नहीं मिला, कनाडा में कैसे भरा जा रहा बारूद

चमचमाती काले रंग की कार, हाथ में .32 बोर की बंदूक, साथ में चलता गैंग और पीछे पुलिस… ये किसी क्राइम ड्रामा फिल्‍म का सीन नहीं। कनाडा में बसे पंजाबी रैपर शुभ के हिट गाने ‘We Rolling’ के लिरिक्‍स हैं। दो साल पहले रिलीज हुआ यह गाना यूट्यूब पर 207 मिलियन से ज्यादा व्यूज़ बटोर चुका है। वह बात अलग है कि शुभ की ‘कूल बैड बॉय’ की इमेज को इस हफ्ते एक के बाद एक झटके लगे। विराट कोहली और केएल राहुल जैसे क्रिकेटर्स ने उन्‍हें X (पहले ट्विटर) पर फॉलो करना बंद कर दिया। शुभ का भारत के कई शहरों में होने वाला टूर कैंसिल हो गया। उनकी स्पांसरशिप वापस ले ली गई। इन सबके पीछे कुछ महीने पहले की एक घटना है। शुभ ने इंस्‍टाग्राम पर भारत का गलत मैप लगाकर प्रो-खालिस्‍तानी पोस्ट करते हुए ‘Pray for Punjab’ कैप्‍शन दिया था। बाद में पोस्ट डिलीट कर दी मगर नुकसान तो हो चुका था।

पीएम जस्टिन ट्रूडो ने कनाडाई संसद में भारत पर खालिस्तान टाइगर फोर्स (KTF) के प्रमुख हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया। भारत ने ‘बेहूदा’ करार देखकर आरोपों को सिरे से नकारा। कुछ दिन के भीतर, दोनों देशों के डिप्लोमैटिक रिश्ते रसातल में पहुंच गए हैं। जाहिर है शुभ को इसकी चपेट में आना ही था। आखिर शुभ जैसों का खालिस्तान आंदोलन से कितना जुड़ाव है? अगर आप कनाडा में खालिस्‍तानी आंदोलन की जड़ तक जाएंगे तो काफी कुछ समझ में आ जाएगा। पढ़‍िए।

पॉप कल्चर से खालिस्तान का प्रचार

पॉप कल्चर से खालिस्तान का प्रचार

पॉप कल्चर, खासकर रैप म्यूजिक ने खालिस्तानी प्रॉपेगैंडा फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रैपर शुभ अकेले नहीं हैं जिन्होंने खालसा की भावना को बढ़ावा दिया और हिंसा का महिमामंडन किया। कनाडा में बसे कई सिंगर जिनके बड़ी संख्या में फॉलोअर्स हैं, जैसे ‘ब्राउन मुंडे’ फेम पंजाबी गायक एपी ढिल्लों। उन्‍होंने भी इसी तरह की पोस्ट साझा की थी, जिसे बाद में हटा दिया। जैजी बी का गाना ‘पुत्त सरदार दे’ और सिद्धू मूसेवाला का ‘SYL’ उग्रवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले और गैंगस्टर कल्चर का महिमामंडन करता है, जिसे अक्सर गलती से सिख समुदाय से जोड़ दिया जाता है। कनाडाई पत्रकार रेनू बख्शी बताती हैं कि कैसे ‘पंजाबी लड़के एक कठोर पितृसत्ता के कंट्रोल वाले टेस्टोस्टेरोन से भरे वातावरण में बड़े होते हैं।” पितृसत्ता से हिंसा की तरफ छलांग उन्‍हें छोटी लगती है।

खालिस्तान: क्यों आकर्षित करता है अलगाववादी विचार

खालिस्तान: क्यों आकर्षित करता है अलगाववादी विचार

भारत में खालिस्तान आंदोलन और सिखों के लिए एक अलग राज्य के आइडिया को खास भाव नहीं मिला। फिर कनाडाई प्रवासी इसके प्रति इतने आकर्षित क्यों हैं? इसकी एक वजह अन्याय की कथित भावना है। विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई इतिहास के प्रफेसर नीलेश बोस का कहना है कि खालिस्तान के विचार के पीछे ड्राइविंग फोर्स यह धारणा है कि भारत ने अलग-अलग टाइम में सिखों को नुकसान पहुंचाया है या उनके साथ अन्याय किया है, जैसे कि 1984 या उसके बाद। उन्होंने कहा, ‘यह एक अलग देश की मांग नहीं बल्कि न्याय की तलाश है जिसका मौजूदा प्रक्रियाओं या विकल्पों में कोई रास्ता नहीं दिखता।‘ लेकिन बोस कहते हैं कि ऐसी भावनाएं प्रवासी भारतीयों के एक छोटे से अल्पसंख्यक वर्ग तक ही सीमित हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं यह नहीं कहूंगा कि यह भावना सिख आबादी के सभी क्षेत्रों में व्यापक है, बल्कि कनाडा में सिखों के एक उपसमूह में है।

खालिस्तान उन अप्रवासियों के लिए एक आदर्श मातृभूमि की तरह उभरता है जिन्होंने कनाडा में भेदभाव झेला है। सरे में क्वांटलेन पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर शिंदर पुरेवाल कहते हैं, ‘अपनी बहुसंस्कृतिवाद और अल्पसंख्यक अधिकारों की बयानबाजी के बावजूद, कनाडा में अभी भी नस्लवाद की गंभीर समस्या है, खासकर पगड़ी वाले सिखों जैसे गैर-श्वेत समूहों के खिलाफ। कनाडाई स्कूलों और सामाजिक भेदभाव से गुजरने वाले बच्चे अंदरूनी पहचान से बचने की तलाश करते हैं।‘ उन्होंने आगे कहा कि वे सिख पहचान के बारे में बड़े पैमाने पर प्रॉपेगैंडा से परेशान हैं, खासकर यह कैसे दूसरों से अलग है। इसे उनके सामने पेश किए गए सिख साम्राज्य के गौरवशाली सपने के साथ जोड़ दें, तो उनमें से कुछ लोग यह सोचने लगते हैं कि महाराजा रणजीत सिंह की तरह उनका भी अपना राज्य हो सकता है।

सिख पहचान: अतीत की ओर

सिख पहचान: अतीत की ओर

सिखों के लिए, महाराजा रणजीत सिंह का शासनकाल संप्रभुता और स्वशासन के स्वर्णिम काल का प्रतिनिधित्व करता है। शिक्षाविदों का कहना है कि सिख पहचान के बारे में सवाल विभाजन के तुरंत बाद शुरू हुए जब सिखों को लगा कि उन्हें जल्द ही राहत मिल गई है। पंजाब हरित क्रांति का जन्मस्थान और देश की रोटी की टोकरी बन गया, लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझना रहा। यह असंतोष की भावना थी जिसे उग्रवादी भिंडरावाले ने भुनाया। 1984 की उथल-पुथल वाली घटनाओं – ऑपरेशन ब्लूस्टार और सिख विरोधी दंगों – के बाद सिखों को लगा कि उन्हें न्याय नहीं मिला है। इसके बाद 1985 में एयर इंडिया पर बमबारी हुई जिसमें 329 लोग मारे गए लेकिन अपराधियों को कभी सजा नहीं दी गई।

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