जेपी का आंदोलन और चंद्रशेखर की चिट्ठी, 46 साल बाद सच हो रही लालू-नीतीश के लिए ‘भविष्यवाणी’
जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने पटना के गांधी मैदान में 5 जून 1974 को दो शब्दों ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया था। उसके बाद लगभग ढाई साल की अवधि में ही इन दो शब्दों ने देश की सियासत में भूचाल खड़ा कर दिया। सबसे पहले इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात इमरजेंसी की घोषणा कर दी और विरोधी विचारधारा वाले नेताओं की गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसना शुरू किया। उनकी इस दमनकारी कदम के बावजूद आजादी के बाद से सत्ता पर काबिज कांग्रेस के आखिरकार पांव उखड़ने से नहीं बचे। जिस सत्ता को बचाने के लिए इंदिरा ने इमरजेंसी थोपी, पब्लिक ने 1977 में उसका बदला ले लिया। पब्लिक ने विपक्षी दलों के गठजोड़ से बनी जनता पार्टी के हाथ में सत्ता सौंप दी। जेपी की जयंती और पुण्यतिथि पर संपूर्ण क्रांति की इस बड़ी सफलता को याद किया जाता है। गैर कांग्रेसी दल हर साल 5 जून को संपूर्ण क्रांति दिवस मनाते रहे हैं। 25 जून को इमरजेंसी की त्रासदी को याद करते हैं। अफसोस कि जिन लोगों ने उस वक्त कांग्रेस शासन का विरोध किया था, आज उसी के साथ गलबहियां डाले हुए हैं।
जेपी ने समझाया था संपूर्ण क्रांति का उद्देश्य
वर्ष 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश के निर्माण तक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकप्रियता ने उन्हें भारी बहुमत से सत्ता में लौटने का अवसर दे दिया था। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से तबाह जनता ने पाकिस्तान को तोड़ कर बांग्लादेश बनाने की इंदिरा की कूटनीतिक पहल की कामयाबी पर उन्हें सत्ता का तोहफा दिया। अब यह दायित्व इंदिरा का था कि जनता की समस्याओं का वे कोई समाधान निकालें। नतीजतन इंदिरा गांधी के शासन के प्रति जनता में आक्रोश बढ़ता गया। जन आक्रोश पहली बार मुखर तब हुआ, जब फीस वृद्धि और बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर गुजरात में छात्रों ने आंदोलन शुरू किया। गुजरात के आंदोलन की गूंज देश के दूसरे राज्यों में भी साफ-साफ सुनाई देने लगी। बिहार में गुजरात से भी बड़े आंदोलन की कुलबुलाहट होने लगी।




