Nitish with NDA: नीतीश के I.N.D.I.A छोड़ NDA में जाने की सियासी जमीन तैयार! JDU की 17 सीटों वाली डिमांड में छिपा बड़ा राज
नीतीश कुमार बिहार में फिलवक्त तीसरी बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेता हैं। विधायकों की दृष्टि से। सांसदों के मामले में वे भाजपा के बराबर की स्थिति में हैं। बीजेपी के 17 सांसद बिहार में हैं तो जेडीयू के 16 हैं। कांग्रेस का भी एक सांसद है। सांसदों के मामले में आरजेडी फिसड्डी है। पर, विधायक उसके पास जेडीयू से दोगुने से 10 ही कम हैं। फिर भी नीतीश बिहार के बादशाह बने हुए हैं। उनके तेवर देख कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि 45 विधायकों वाली पार्टी के वे मजबूत या कमजोर नेता हैं। उनके इस अंदाज का राज क्या है ?
नीतीश कुमार के दोनों हाथ में लड्डू है
नीतीश कुमार भाजपा के साथ लंबी पारी खेल चुके हैं। केंद्र से लेकर बिहार तक भाजपा से उनकी नजदीकी दो दशक तक रही है। भाजपा नेताओं की पुण्यतिथि या जयंती समारोह आयोजित करने में नीतीश को तनिक भी संकोच नहीं होता। पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठने में भी अब उन्हें संकोच नहीं। वे जितनी सहजता से लालू यादव, तेजस्वी यादव या राबड़ी देवी से मिलते हैं, उतनी ही सहजता से वे भाजपा के इन दो शीर्ष नेताओं से भी मिलते रहे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो नीतीश के दोनों हाथ में लड्डू है। उनके बाएं हाथ में इंडी अलायंस है तो दाईं हथेली पर एनडीए। अब उनका मन कि वे किस हाथ का लड्डू इस बार लोकसभा चुनाव में ग्रहण करते हैं।
नीतीश सीट बंटवारे के लिए बेचैन क्यों
इसमें किसी को संदेह नहीं कि नीतीश अभी इंडी अलायंस के साथ हैं। यह कहें कि इंडी अलायंस की अवधारणा ही नीतीश की है। इसे खड़ा करने में उनकी भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। आश्चर्य की बात यह कि इतना करने के बावजूद नीतीश हाशिये पर हैं। गठबंधन में उनकी बात नहीं सुनी जा रही। उन्हें कोई जिम्मेवारी नहीं दी गई। उनकी नाराजगी का एहसास भी इंडी अलायंस के नेताओं को है। इसके बावजूद कोई उन्हें मना नहीं रहा। उल्टे लोकसभा की सिटिंग सीटों में कतर ब्योंत का खतरा उनके सिर मंडरा रहा है। यह भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि जेडीयू को कितनी सीटें मिलेंगी। वे भी खूंटा गाड़ चुके हैं। जेडीयू के नेता कहते हैं कि 16 सीटें तो उनकी जीती हुई हैं। लड़ाई तो 17 पर जेडीयू ने लड़ी थी। इसलिए 17 से कम पर मानने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। बिहार में इंडी अलायंस में छह दल शामिल हैं। सीट बंटवारे में नीतीश को मुश्किल नजर आ रही है। लेफ्ट की दो पार्टियों ने आठ सीटें मांगी हैं। सीपीआई (एमएल) को पांच सीटें तो सीपीआई को तीन सीटें चाहिए। कांग्रेस 11 सीटों पर अड़ी है। ऐसे में 21 सीटें बचती हैं। इन्हीं सीटों में आरजेडी और जेडीयू भी हैं। नीतीश की हड़बड़ी इसी वजह से है। वे आश्वस्त होना चाहते हैं कि आखिरकार उनकी सीटें अक्षुण्ण रहेंगी या कटौती की नौबत आएगी।
एनडीए का बंद दरवाजा खुल सकता है
महागठबंधन के साथ जेडीयू के जाने पर बीजेपी ने नीतीश की वापसी के दरवाजे बंद कर दिए थे। उन पर भाजपा के नेता निजी हमले तक करने लगे थे। पर, इंडी अलायंस में नीतीश की खटपट की जानकारी मिलते ही भाजपा ने चुप्पी साध ली है। नीतीश पर अब हमले नहीं हो रहे। केंद्रीय नेतृत्व खामोश है। भाजपा के स्थानीय नेता भी नीतीश की व्यक्तिगत आलोचना से बच रहे हैं। नीतीश की इंडी अलायंस के प्रति अनिष्ठा का ख्याल कर बीजेपी ने यह रणनीति अपनाई है। भाजपा को उम्मीद है कि पिछली बार की तरह नीतीश और भाजपा के साथ आ सकते हैं। यह भी संभव है कि इस बाबत उनकी बातचीत भाजपा से चल भी रही हो।



