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आठ साल में तीन ठांव, नहीं टिके स्वामी के पांव… लोकदल से लेकर अपनी पार्टी तक, ऐसा रहा है सियासी सफर

स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंगलवार को समाजवादी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दिया। पिछले लगभग आठ साल में यह तीसरा ठांव है, जहां से स्वामी ने पांव निकाले हैं। हर बार पार्टी छोड़ने की वजहें एक सी गिनाई गईं और जिस दल ने छोड़ा उनके ओर से स्वामी पर लगने वाले आरोप भी एक जैसे ही रहे हैं। हालांकि, अब स्वामी खुद अपनी पार्टी बना रहे हैं तो ‘भटकने’ का सिलसिला शायद रुक जाए। लगभग 20 साल तक बसपा में राजनीति करने के बाद 2016 की गर्मियों में स्वामी ने मायावती को तेवर दिखाते हुए बसपा से इस्तीफा दे दिया था। बसपा में उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष, सरकार में मंत्री, विधान परिषद में नेता सदन से लेकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तक का अहम ओहदा पाया। यहां तक कि 2007 में चुनाव हारने के बाद भी मायावती ने उन्हें सरकार में राजस्व मंत्री बनाया और विधान परिषद भेजा।

बसपा से मोहभंग होने के बाद स्वामी 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा में आए। पडरौना से विधायक व योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। बेटी संघमित्रा मौर्य को भी 2019 में बदायूं से लोकसभा का टिकट मिला और वह संसद पहुंच गईं। हालांकि, 22 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जनवरी की सर्दियों में स्वामी का मिजाज सरकार व भाजपा को लेकर गर्म हो गया। पिछड़ों, किसानों, नौजवानों की चिंता का हवाला देकर वह सपा में चले आए। बेटी अभी भी भाजपा में ही हैं।

कद भी, पद भी, विवाद भी

स्वामी की अखिलेश ने धूमधाम से ज्वाइनिंग कराई थी। सपा की सीटों को दोगुना बढ़ाने का दावा कर रहे स्वामी प्रसाद मौर्य हालांकि फाजिलनगर से अपनी ही सीट पर हार गए और उनके साथ आए कुछ और विधायकों को भी हार का सामना करना पड़ा। हार के बाद अखिलेश ने स्वामी को संगठन में महासचिव बनाने के साथ ही एमएलसी बनाकर उच्च सदन भी भेजा। हालांकि, धार्मिक मुद्दों पर स्वामी के विवादों को लेकर सपा के भीतर लगातार सवाल उठे, लेकिन, अखिलेश ने एकाध मौकों को छोड़कर उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

पीडीए को चुनावी मुद्दा बना रही सपा पर भी पिछड़ा, दलित विरोधी होने का आरोप लगा स्वामी नई राह पर निकल गए हैं। पहले भी स्वामी का सियासी सफर दल-बदल से भरा रहा है। 1980 में लोकदल से सियासत शुरू करने वाले स्वामी ने 1991 में जनता दल का दामन थाम लिया था। 1996 में जनता दल व सपा का समझौता हुआ तो स्वामी बसपाई हो गए।

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