नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट 16 अप्रैल को वक्फ संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर सकता है।
डीएमके और कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने सोमवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। एआईएमपीएलबी और एआईएमआईएम ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
याचिकाकर्ताओं ने इस अधिनियम को मनमाना, भेदभावपूर्ण और मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया है।
डीएमके ने अपनी याचिका में कहा कि केंद्र सरकार ने व्यापक विरोध के बावजूद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और अन्य हितधारकों द्वारा उठाए गए आपत्तियों पर उचित विचार किए बिना इस विधेयक को पारित किया।
कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने भी इसी तरह की चिंताएं व्यक्त की हैं और अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने भी इस अधिनियम को चुनौती देते हुए कहा है कि यह मुस्लिम अल्पसंख्यक को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन से अलग करता है।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी इस मामले में याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं। उन्होंने तर्क दिया है कि यह अधिनियम वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा को कमजोर करता है और अन्य धार्मिक बंदोबस्ती की तुलना में मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है।
केंद्र सरकार ने इन याचिकाओं के जवाब में सुप्रीम कोर्ट में एक कैविएट दाखिल किया है, जिसमें अनुरोध किया गया है कि इस मामले में कोई भी आदेश पारित करने से पहले उसे सुना जाए।
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ के 16 अप्रैल को इन याचिकाओं पर सुनवाई करने की संभावना है। यह मामला मुस्लिम समुदाय और केंद्र सरकार के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और धार्मिक स्वतंत्रता पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।



