झारखंड के चर्चित शराब घोटाले ने एक बार फिर सुर्खियां बटोर ली हैं। मुख्य गवाह सिद्धार्थ सिंघानिया के बयान ने माहौल बदल दिया है। यह बयान अदालत में विधिवत दर्ज कराया गया है। बयान में सत्ता और सिस्टम की मिलीभगत का जिक्र है। छत्तीसगढ़ के शराब मॉडल को झारखंड में लागू करने की बात कही गई है। यह फैसला योजनाबद्ध बताया गया है। इससे सरकारी नीतियों पर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक दलों में बेचैनी देखी जा रही है। बयान के बाद चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। आने वाले दिनों में विवाद और बढ़ सकता है।
गवाह के अनुसार, नीति निर्माण में कुछ चुनिंदा लोगों की भूमिका रही। तत्कालीन उत्पाद सचिव पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने की बात सामने आई है। छत्तीसगढ़ से जुड़े लोगों को फायदा पहुंचाया गया। कंसल्टेंसी और लाइसेंस प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। अदालत को बताया गया कि फैसले पहले से तय थे। सरकारी संस्थाओं का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए हुआ। पूरे सिस्टम को नियंत्रित किया गया। राजनीतिक संरक्षण के बिना यह संभव नहीं था। बयान ने कई परतें खोल दी हैं।
सबसे बड़ा मुद्दा पैसों के लेनदेन का है। गवाह ने करोड़ों की घूस का दावा किया है। यह रकम अलग-अलग माध्यमों से पहुंचाई गई। शराब दुकानों का संचालन भी निजी हाथों में दिया गया। कर्मचारियों की नियुक्ति रणनीतिक बताई गई है। इससे पूरे नेटवर्क पर पकड़ बनी रही। होलोग्राम जैसी तकनीकी व्यवस्था भी एक ही कंपनी को दी गई। जांच एजेंसियों के लिए यह बयान निर्णायक माना जा रहा है। राजनीतिक जवाबदेही की मांग उठने लगी है। मामला अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है।


