रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट ने महादेव उरांव की अवमानना याचिका पर अपना फैसला सुनाया। न्यायालय ने पहले पारित एकल पीठ के आदेश को वापस लेने का निर्देश दिया। यह आदेश मधुकम क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया। कोर्ट के अनुसार प्रतिवादियों से प्राप्त धनराशि का उल्लेख नहीं किया गया था। संबंधित पक्षों को प्रतिवादी नहीं बनाए जाने पर भी अदालत ने टिप्पणी की। न्यायालय ने इसे गंभीर चूक माना। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में सभी तथ्य स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक है। गलत जानकारी देने से न्यायालय को गुमराह नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने अपना निर्णय सुनाया।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 12 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि 12 प्रतिवादियों को बराबर-बराबर दी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि शपथ पत्र में सही जानकारी नहीं दी गई थी। फैसले में हस्तक्षेपकर्ताओं से हुए लेनदेन का भी उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि इस तथ्य को छिपाया गया था। मामले में अधिवक्ता सचिन कुमार और गौरव राज ने हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से पक्ष रखा। दोनों पक्षों की दलीलों पर सुनवाई के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा था। इसके बाद विस्तृत आदेश जारी किया गया। अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी जोर दिया। फैसले को मामले का महत्वपूर्ण कानूनी पड़ाव माना जा रहा है।
मामला खादगढ़ा शिव-दुर्गा मंदिर रोड की मुंडारी प्रकृति की जमीन से जुड़ा है। जिला प्रशासन ने यहां बने 12 मकानों को हटाने की कार्रवाई शुरू की थी। बुलडोजर चलने के दौरान स्थानीय लोगों ने विरोध जताया था। लोगों का कहना था कि उन्होंने जमीन खरीदने के लिए बड़ी राशि का भुगतान किया था। उनके अनुसार प्रति कट्ठा 5.25 लाख रुपये की दर से जमीन खरीदी गई थी। कुल भुगतान एक करोड़ आठ लाख रुपये से अधिक बताया गया। स्थानीय लोगों ने वर्षों से वहां रहने का दावा भी किया। बेदखली की कार्रवाई को लेकर विवाद बढ़ गया था। हाईकोर्ट के फैसले के बाद मामले में नई कानूनी स्थिति बनी है। आगे की कार्रवाई अब कानून के अनुसार की जाएगी।



