दौरा नीतीश का, फायदा विपक्ष का? जानिए ‘प्लान 212’ का सारा खेल यहां
बिहार के सीएम नीतीश कुमार विपक्षी एकता के लिए बेचैन-से दिखते हैं। विपक्षी दलों को साथ लाने के लिए वे मैराथन यात्राएं भी कर रहे हैं। दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ, भुवनेश्वर की यात्रा वे अब तक कर चुके हैं और गुरुवार को मुंबई भी इसी मकसद से जाने वाले हैं। विपक्षी एकता के उनके गणित और 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष की हालत देख सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कामयाबी आसान नहीं…
विपक्षी एकता के प्रयासों में लगातार मिल रही सफलता से बिहार के सीएम नीतीश कुमार काफी उत्साहित हैं। मंगलवार को ओडिशा के सीएम और बीजेडी नेता नवीन पटनायक से खुशनुमा मुलाकात के बाद नीतीश कुमार गुरुवार को मुंबई के दौरे पर होंगे। तय कार्यक्रम के मुताबिक वे वहां एनसीपी नेता शरद पवार और शिवसेना के एक धड़े के नेता उद्धव ठाकरे से मुलाकात करेंगे। अब तक के उनके साथ संबंधों को देखते हुए यह पक्की उम्मीद है कि नीतीश की यह यात्रा भी अपने मकसद में कामयाब ही होगी।
क्या है नीतीश कुमार विपक्षी एकता का गणित
दरअसल नीतीश कुमार मिल तो सभी विपक्षी दलों के नेताओं से रहे हैं, लेकिन उनके निशाने पर बिहार, झारखंड, बंगाल, ओडिशा , दिल्ली और महाराष्ट्र प्रमुख रूप से हैं।
बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। झारखंड में 14, बंगाल में 42, महाराष्ट्र में 48, ओडिशा में 21, यूपी में 80 और दिल्ली में 7 सीटें हैं। यानी अब तक नीतीश ने जिन नेताओं से मुलाकात की है या करने वाले हैं, वहां लोकसभा की कुल सीटें 212 होती हैं। देश में लोकसभा की 543 सीटें हैं। दक्षिणी राज्यों की सीटों को भी शामिल कर लें तो तकरीबन कुल सीटों में आधी से अधिक विपक्षी दलों के प्रभाव वाले राज्यों में हैं। नीतीश का मानना है कि चुनाव पूर्व अगर इन राज्यों में विपक्षी एकता का प्रयास सफल रहता है तो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की विफलताएं गिना कर कामयाबी हासिल की जा सकती है। विपक्ष के पास मोदी सरकार की विफलताओं में महंगाई, बेरोजगारी, सांप्रदायिक कटुता और सार्वजनिक क्षेत्र को बेचने जैसे मुद्दे हैं, जिन्हें लोगों को बता-समझा कर विपक्ष बाजी मारने की उम्मीद पाले हुए है। जो विपक्षी दल अभी एकता प्रयास में शामिल नहीं हो पाएंगे, संभव है कि जीत के बाद वे मजबूत विपक्ष के साथ बाद में आ जाएं।
बिहार में विपक्ष को कामयाबी की उम्मीद है
सवाल यहीं खड़ा होता है। जिन सीटों की गणना पर नीतीश उत्साहित हैं, क्या सच में उन पर कामयाबी आसानी से मिल जाएगी ? बिहार में सात दलों का मजबूत गठबंधन है। सभी दलों के मिलते रहे वोट शेयर को सम्मिलित कर दें तो तकरीबन 80 प्रतिशत वोटों पर विपक्षी दलों का कब्जा है। अगर सीटों की शेयरिंग पर सवाल आसानी से सुलझ गया तो विपक्ष बाजी मार सकता है। इसलिए कि बीजेपी के साथ रहते नीतीश देख चुके हैं कि 40 में 39 सीटों पर 2019 में एनडीए ने बाजी मार ली थी। तब नीतीश कुमार जैसी प्रभावशाली सियासी शख्सियत एनडीए में थी। पिछली बार शेयरिंग में मिलीं 17 सीटों में से 16 पर नीतीश की पार्टी जेडीयू के उम्मीदवार जीत गए थे। अब नीतीश महागठबंधन के साथ हैं। अगर पुराना ट्रेंड बरकरार रहा तो एनडीए को बिहार में भारी नुकसान हो सकता है। इसलिए कि अब बीजेपी के अलावा एनडीए में छोटे दल ही बच गए हैं। उनमें एक उपेंद्र कुशवाहा की नई नवेली पार्टी आरएलजेडी भी है।




