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कुर्सी में फंस गई रिश्तों की डोर, सियासत के ‘चाचा-भतीजों’ की बड़ी फिल्मी है कहानी

शरद पवार और अजित पवार। ये भारतीय राजनीति के कुछ सबसे सफल चाचा-भतीजे की जोड़ियों में थी लेकिन अब ये जोड़ी टूट चुकी है। किसी परिवार विशेष के नियंत्रण में चलने वाली पार्टियों में इस तरह की टूट देखने को मिलती ही मिलती हैं। खासकर तब जब वक्त अगली पीढ़ी को विरासत सौंपने का आता है। हर बार टूट की कहानी तकरीबन एक जैसी होती है- महत्वाकांक्षाओं का टकराव, भेदभाव के आरोप। वहीं दलीलें कि योग्य हैं मगर वो सबकुछ नहीं मिल रहा जिसके हकदार है, क्योंकि किसी के सगे बेटे नहीं हैं या सगे भाई नहीं हैं। कभी चाचा की ये शिकायत रहती है तो कभी भतीजे की। अजित पवार ने भी शरद पवार पर यही आरोप लगाया है कि उनका हक मारा गया, अगर वह किसी अन्य के पेट से जन्मे तो इसमें उनका क्या कसूर। आइए नजर डालते हैं सियासत में चाचा-भतीजे की कामयाब जोड़ियों और उनकी टूट पर।

समाजवादी पार्टी में भी चाचा-भतीजे में टकराव इतना बढ़ा कि दोनों की राहें जुदा हो गईं। बात कर रहे हैं शिवपाल यादव और अखिलेश यादव की। मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की बुनियाद रखी और उनके भाई शिवपाल यादव ने अपनी मेहनत से पार्टी को सींचा, आगे बढ़ाया। पार्टी में उनका एक अलग ही कद था, रुतबा था। लेकिन अखिलेश यादव की सियासत में एंट्री के कुछ साल बाद परिवार में खींचतान बढ़ने लगा। 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पहली बार अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिला। मुलायम सिंह यादव ने तब सबको चौंका दिया जब उन्होंने खुद के बजाय बेटे अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने का ऐलान किया। बाद में जब बढ़ती उम्र और सेहत की वजह से मुलायम की सक्रियता घटी तो पार्टी में अंदरखाने उत्तराधिकार की जंग छिड़ गई। शिवपाल यादव खुद को मुलायम सिंह यादव का उत्तराधिकारी के तौर पर देख रहे थे तो अखिलेश खुद को। 2017 में यूपी की सत्ता से सपा के बाहर होने के बाद ये जंग और तीखी हो गई। बात इतनी बिगड़ गई कि 2018 में शिवपाल ने बगावत कर दी। ‘प्रगतिशील समाजवादी पार्टी’ नाम से एक अलग दल बनाया। लेकिन सपा से अलग होकर शिवपाल सियासत में कोई छाप नहीं छोड़ पाए और आखिरकार सपा में लौट आए। यहां भी चाचा पर भतीजा भारी पड़ा और अखिलेश यादव सपा के निर्विवाद नेता के तौर पर और मजबूती से स्थापित हुए।

महाराष्ट्र इससे पहले भी सियासत में चाचा-भतीजे की धमक और बाद में सुपरहिट जोड़ी के अलाव का गवाह रह चुका है। ये जोड़ी थी शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और उनके भतीजे राज ठाकरे की। लेकिन ये जोड़ी भी टूट गई। राज ठाकरे बाल ठाकरे के छोटे भाई श्रीकांत ठाकरे के बेटे हैं। उनकी मां कुंडा ठाकरे बाल ठाकरे की पत्नी मीना ठाकरे की सगी बहन हैं। यानी उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे न सिर्फ चचेरे भाई हैं बल्कि मौसेरे भाई भी हैं। राज ठाकरे ने शिवसेना की स्टूडेंट विंग भारतीय विद्यार्थी सेना की लॉन्चिंग के साथ सियासत में एंट्री ली। 1990 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उन्होंने धुआंधार और आक्रामक प्रचार किया। जल्द ही शिवसेना में उनका कद बाल ठाकरे के बाद नंबर दो का हो गया। राज ठाकरे की भाषण शैली हो या हिंदुत्व और मराठी अस्मिता के मुद्दे पर उनका आक्रामक अंदाज, वह अपने चाचा की कॉर्बन कॉपी जैसे थे। सियासी गलियारों में उन्हें बाल ठाकरे के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाने लगा। लेकिन जब चचेरे भाई उद्धव ठाकरे को ज्यादा तरजीह मिलने लगा तब नवंबर 2005 में राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ने का ऐलान कर दिया। मार्च 2006 में उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया। बाल ठाकरे के निधन के बाद उद्धव और राज के साथ आने की अटकलें जरूर लगीं लेकिन परिवार एक नहीं हो सका।

महाराष्ट्र के बाल ठाकरे और राज ठाकरे की तरह ही पंजाब में प्रकाश सिंह बादल और मनप्रीत बादल के रूप में चाचा-भतीजे की जोड़ी कभी बहुत हिट रही थी। मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और शिरोमणि अकाली दल के दिग्गज नेता प्रकाश सिंह बादल के भाई गुरदास सिंह बादल के बेटे हैं। 1995 में मनप्रीत पहली बार विधायक बने। अकाली दल के टिकट पर 2007 तक लगातार 4 बार विधायक चुने गए। 2007 में पंजाब की प्रकाश सिंह बादल सरकार में वित्त मंत्री भी बने लेकिन धीरे-धीरे बादल फैमिली में भी खींचतान शुरू हो गई। पार्टी में प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर सिंह बादल को ज्यादा तवज्जो मिलने से मनप्रीत असहज होते गए और कुछ मुद्दों पर पार्टी के आधिकारिक रुख के खिलाफ खुलकर बोलने भी लगे। अक्टूबर 2010 में उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में अकाली दल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उसके बाद मनप्रीत सिंह बादल ने 2011 में पीपल्स पार्टी ऑफ पंजाब नाम से एक नई पार्टी बनाई। 2012 के पंजाब चुनाव में वह दो सीटों से लड़ें लेकिन दोनों पर ही हार का सामना करना पड़ा। 2016 में मनप्रीत ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया। कैप्टन अमरिंदर सरकार में भी वह मंत्री रहे। लेकिन जनवरी 2023 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। फिलहाल मनप्रीत बादल बीजेपी में हैं।महाराष्ट्र में ठाकरे और पवार परिवार, यूपी में मुलायम सिंह यादव फैमिली, पंजाब में बादल परिवार की तरह ही बिहार में पासवान परिवार भी चाचा-भतीजे की सियासी जंग देखने को मिली। लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी पार्टी टूट गई। 8 अक्टूबर 2020 को पासवान के निधन के बाद उनके भाई पशुपति नाथ पारस और बेटे चिराग पासवान के बीच सियासी उत्तराधिकार की जंग छिड़ गई। पार्टी दो हिस्सों में बंट गई- लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) और राष्ट्रीय लोकजनशक्ति पार्टी। लोजपा (रामविलास) की कमान चिराग पासवान के हाथ में तो राष्ट्रीय लोजपा की कमान पशुपतिनाथ पारस के हाथ में। 2020 के विधानसभा चुनाव में खुद को मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान तो तब बड़ा झटका लगा जब उनके चाचा पशुपति पारस को मोदी सरकार में मंत्री बना दिया गया। अब स्थितियां फिर बदली हैं। कयास लग रहे हैं कि चिराग पासवान को मोदी मंत्रिपरिषद में जगह मिल सकती है और चाचा की मंत्री पद से छुट्टी हो सकती है।

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