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नाम के आगे से जाति सूचक टाइटल हटाने वाले लालू-नीतीश क्यों करवा रहे हैं जातीय जनगणना? जानें पॉलिटिक्स का सीक्रेट मंत्र

पटना हाई कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद बिहार में जातीय जनगणना का कार्य एक बार फिर से शुरू हो चुका है। बिहार सरकार जल्द ही जातीय जनगणना को पूरा करने के मिशन पर है। ऐसे में कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिस बिहार में ज्यादातर लोगों के नाम के आगे जाति सूचक शब्द नहीं होते हैं, वहां जातीय जनगणना जैसे कार्य को इतना तवज्जो क्यों दिया जा रहा है। नाम के आगे जाति सूचक शब्द लगाने और हटाने की पीछे कहानी का खुलासा बाहुबली पूर्व सांसद आनंद मोहन ने की है। आनंद मोहन ने डिटेल में बताया कि आखिर लालू प्रसाद, नीतीश कुमार सरीखे नेता जिन्होंने एक वक्त में अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्दों को हटाया था वह आज जाति जनगणना को लेकर इतने आतुर क्यों दिख रहे हैं।

दरअसल, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, आनंद मोहन सरीखे बिहार के ज्यादातर नेता जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की पैदाइश हैं। ये सभी नेता कहीं ना कहीं जेपी के अनुवायी रहे हैं। हालांकि बदलते वक्त के साथ इनकी राजनीति करने के तरीके में काफी बदलाव दिखता रहा है, लेकिन शुरुआती दिनों में बिहार के तमाम समाजवादी नेता जेपी की बताई बातों को अमल में लाते थे।

जेपी के कहने पर जाति सूचक शब्दों से बचने लगे थे नेता

आनंद मोहन ने एक यूट्यब चैनल से बातचीत में बताया कि जयप्रकाश नारायण ने नारा दिया था ‘जात पात के मिटे निशान, मानव-मानव एक समान।’ जेपी के इस नारे के बाद उस वक्त आंदोलन से जुड़े तमाम युवा नेताओं ने अपने नाम के आगे से जाति सूचक टाइटल हटा लिया था, जिसमें लालू यादव ने अपना नाम लालू प्रसाद लिखना शुरू कर दिया था। नीतीश कुमार सिंह अपना नाम नीतीश कुमार लिखने लगे थे। शिवानंद तिवारी अपना नाम शिवानंद लिखने लगे। आनंद मोहन सिंह अपना नाम आनंद मोहन लिखने लगे। जेपी ने आह्वान किया था- दाढ़ी-चोटी और जेनऊ ये तीनों तिकड़म के निशान हैं, इसलिए अगर सच्चे समाजवादी बनना चाहते हैं तो इन्हें त्याग दीजिए। मुसलमानों से दाढ़ी कटवाने को कहा गया। हिन्दुओं की उच्च जातियों को जेनऊ और नाम जाति सूचक टाइटल हटाने को कहा गया। जेपी के कहने पर उस दौर के युवा समाजवादी नेताओं ने जेनऊ और जाति सूचक टाइटल का त्याग कर दिया।

आज जातीय जनगणना कराने के सवाल पर आनंद मोहन ने बताया कि अंग्रेजों ने जातीय जनगणना करवा था। आजादी के बाद आरक्षण देकर सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों और दलितों को मिला। आरक्षण पुरानी जनगणना के आधार पर अनुमान के आधार पर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जातीय जनगणना का लोगों को बेहिचक सामना करना चाहिए। कोई कहता है कि वह मुठ्ठी भर हैं, कोई ढाकी भर हैं। यह भ्रम टूटना चाहिए। रियलिटी सामने आना चाहिए कि कौन कितना है।

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