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आलीशान बंगला, लग्जरी कार, नौकर-चाकर कुछ भी नहीं, IPS प्रभाकर चौधरी को करीब से देखा है कभी

यूपी मेंअम्बेडकरनगर के एक छोटे से गांव के किसान परिवार में जन्मे आईपीएस अधिकारी प्रभाकर चौधरी इस समय अपनी शोहरत की बुलंदी पर हैं। वैसे तो प्रभाकर चौधरी हमेशा से ही अपने कार्यों को लेकर चर्चा में रहे हैं, लेकिन बरेली के एसएसपी पद से हटाए जाने के बाद अचानक प्रभाकर चौधरी का नाम सोशल मीडिया पर काफी तेजी से ट्रेंड कर रहा है। वहीं पूरे मामले पर प्रभाकर चौधरी के पिता ने भी कड़ी नाराजगी जताते हुए बीजेपी निशाना साधा है। आइए जानते हैं प्रभाकर चौधरी की असली कहानी..

लगन और मेहनत से मिली IPS की कुर्सी

एक साधारण किसान परिवार से निकल कर अपनी कड़ी मेहनत और लगन से प्रभाकर चौधरी जिस मुकाम पर आज पहुंचे हैं वो मुकाम हासिल करना आसान नहीं है। पांच बहनों के बीच प्यार दुलार से पले बढ़े प्रभाकर चौधरी को लेकर कहा जाता है कि बहनों के प्यार ने ही इन्हें आईपीएस की कुर्सी तक पहुंचा दिया।

पिता किसान, मां गृहणी बेहद साधारण परिवार

प्रभाकर चौधरी एक ऐसे साधरण परिवार से आते हैं, जहां पर इनसे पहले कोई भी सरकारी नौकरी में नहीं था। प्रभाकर के नौकरी वाली जिंदगी जितनी चकाचौंध वाली है, निजी जिंदगी वे उतनी ही सादगी से जीते हैं। आईपीएस प्रभाकर चौधरी अम्बेडकरनगर जिले के हंसवर थाना क्षेत्र के ग्राम मेढी सुलेम के पुरवा महमूद पुर के रहने वाले हैं। इनके पिता का नाम पारसनाथ चौधरी है जो पेशे से एक किसान हैं। इनके परिवार में इनकी मां और ताऊ राम नरेश चौधरी हैं। ये भी खेती का ही काम करते हैं।

5 बहनों में अकेले भाई

प्रभाकर चौधरी की पांच बहनें हैं, जिनमें चार बहने बड़ी हैं जबकि एक बहन छोटी है। इनके बहनों की शादी भी जिस घर में हुई है, वो भी बेहद साधारण परिवार के लोग हैं। आईपीएस बनने के बाद प्रभाकर की शादी मिर्जापुर जिले में हुई। इनकी पत्नी का नाम प्रियंका सिंह है जो एक गृहणी हैं। प्रभाकर के दो बेटे भी हैं, जिनका नाम समिक्ष और सोमांस है।

पिता ने 42 साल पहले बनवाया था घर

प्रभाकर का अपने गांव से बेहद लगाव है और वे मौका मिलते ही अक्सर गांव में रहने आ जाते हैं। गांव में एक छोटा सा मकान है जिसे इनके पिता जी ने 1981 में बनवाया था। एक तरफ प्रशासनिक सेवा में आते ही, जहां लोगों की बड़ी हवेलियां, फार्म हाउस के साथ घर पर बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियां खड़ी हो जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ इसके उलट प्रभाकर चौधरी इन सब से अलग एक सादगी भरा जीवन जीने में यकीन रखते हैं।

कोई लग्जरी गाड़ी नहीं, न कोई नौकर

वहीं प्रभाकर इन सब चीजों से काफी दूर हैं। उनका घर काफी छोटा है, इनके घर पर सिर्फ एक स्विप्ट डिजायर कार है। महंगे सोफा और बेड से दूर आज भी इनके यहां लकड़ी का तख्त ,कुर्सी और चारपाई का ही प्रयोग हो रहा है। घर पर कोई भी नौकर नहीं है।

सादगी का किस्सा भी जान लीजिए

गांव और क्षेत्र में प्रभाकर चौधरी और उनके परिवार के ईमानदारी और सरलता की मिसालें दी जाती हैं। ग्रामीण प्रभाकर के जिंदगी की कहानी बताते हुए कहते हैं कि एक बार प्रभाकर गांव आ रहे थे और रास्ते में एक बुजुर्ग ठेले पर गेहूं का बोझ रख रहा था। वृद्ध की अवस्था देख प्रभाकर खुद गाड़ी से उतरे और पहले गेंहू लदवा कर किसान को भेजा फिर खुद गांव के लिए निकले।

जब पिट्ठू बैग लेकर रिपोर्ट लिखाने पहुंचे प्रभाकर चौधरी

एनएसजी कमांडो की ट्रेनिंग कर चुके प्रभाकर चौधरी अपनी फिटनेस का बेहद ख्याल रखते हैं। सपा सरकार ने प्रभाकर चौधरी को अक्टूबर 2016 में कानपुर देहात का एसपी बनाया तो वह स्टूडेंट की तरह एक पिट्ठू बैग लेकर ज्वाइन करने पहुंचे। एक फरियादी की तरह थाने में पहुंचकर साइकिल चोरी की एफआईआर लिखाने की कोशिश की और कोई पुलिसकर्मी पहचान तक नहीं पाया।

साइकिल से पहुंचते थे लोगों से मिलने

कानपुर देहात में ट्रेन हादसा हुआ तो प्रभाकर चौधरी खुद ही हाई मास्क लाइट लगाने, पोल खड़ा कराने लगे, एंबुलेंस के नही पहुंचने पर अपनी गाड़ी से कई घायलों को अस्पताल भेजा। रातभर राहत कार्य की खुद मॉनिटरिंग करते रहे। वाराणसी में कप्तान रहे तो प्रभाकर चौधरी काशी की तंग गलियों में साइकिल से निकलकर लोगों के बीच चाय पीते और लोगों का फीडबैक लेते। यही वजह है कि प्रभाकर चौधरी वाराणसी में महज 8 महीने के अंदर बेहद लोकप्रिय कप्तान हो गए थे।
इनपुट-अनुराग चौधरी

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