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सिर्फ बिहार नहीं… 2024 लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष को कितना कमजोर देखना चाहती है बीजेपी?

कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते-करते क्या बीजेपी विपक्ष मुक्त भारत की स्ट्रैटेजी की तरफ आगे बढ़ रही है। कांग्रेस समेत कई दूसरे विपक्षी दल सरकार पर ऐसा आरोप लगाते रहे हैं। बीते कल यानी रविवार को जब नीतीश कुमार बीजेपी के समर्थन से फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने तो सवाल उठे कि बीजेपी जब जीत रही थी तो फिर उसे नीतीश की जरूरत क्यों। लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को सिर्फ बिहार के एक नेता के तौर पर नहीं देखा जा सकता है। नीतीश कुमार वह चेहरा थे जिन्होंने विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास किया और उनके ही प्रयासों का नतीजा था कि I.N.D.I.A गठबंधन बना। अब जबकि नीतीश कुमार बीजेपी के साथ आ गए हैं तो उनके ही राज्य बिहार में यह चर्चा चल रही है कि विपक्ष के बारात से बीजेपी दूल्हा लेकर चली गई। ऐसी चर्चा भले ही किसी गांव-कस्बे में हो रही है लेकिन इसके मायने तो निकाले ही जाएंगे। चुनाव से ठीक पहले बीजेपी की ओर से विपक्षी दलों पर करारा वार किया गया है। चोट गहरी है। 400+ के टारगेट के साथ बीजेपी चुनावी रणनीति तैयार कर रही है और इस रणनीति के तहत ही ऐसा लग रहा है कि वह कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहती। चुनाव से पहले वह विपक्ष को काफी कमजोर कर देना चाहती है। महाराष्ट्र और बिहार ऐसे सामने दो उदाहरण भी हैं।

बिहार में सियासी उलटफेर के पीछे क्या संदेश
पिछले लोकसभा चुनाव 2019 की बात की जाए तो बीजेपी 17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और इन सभी सीटों पर उसे जीत हासिल हुई थी। इस बार जैसे समीकरण बन रहे थे तो उसमें विपक्ष भी यह मान रहा था कि 40 सीटों वाले राज्य में बीजेपी अपने पिछले आंकड़े से कम नहीं होगी। पिछली बार की तुलना में नुकसान बीजेपी को नहीं हो रहा था फिर बीजेपी को नीतीश की जरूरत क्यों। बिहार के राजनीतिक माहौल को देखा जाए तो नीतीश को बीजेपी की कहीं अधिक जरूरत महसूस हो रही थी। इन सबके बीच एक बड़ा सवाल यह है कि बीजेपी राज्य की सभी सीटों पर नजर बनाए हुए है। जेडीयू, बीजेपी और एलजेपी पिछले चुनाव में साथ गए थे तब 39 सीटों पर कब्जा जमाया था। एक सीट पर सिर्फ एनडीए का कब्जा नहीं हो सका। अब एक बार फिर बीजेपी का मिशन बिहार 40 ऑल पर है। नीतीश साथ नहीं रहते और इंडिया गठबंधन के दूसरे साथी जिसमें आरजेडी, वामदल, कांग्रेस सभी मिलकर लड़ते तो जेडीयू, कांग्रेस, आरजेडी सबके खाते में सीटें जाने की संभावना रहती। अब बीजेपी की कोशिश है कि राज्य में दूसरे दलों के खाते में सीटें न जाए। उसके और उसके सहयोगियों के पास ही सीटें रहे।

48 सीटों वाले राज्य महाराष्ट्र का भी है उदाहरण

कुछ ऐसा ही कुछ समय पहले महाराष्ट्र में हुआ। शिवसेना टूट चुकी थी और बीजेपी के साथ मिलकर शिंदे सरकार चला रहे थे। इसी बीच एनसीपी में भी टूट की खबर आती है और अजित पवार अपने पार्टी के सांसदों और विधायकों को लेकर बीजेपी के पास चले आते हैं। शरद पवार की एनसीपी भी टूट जाती है। अजित पवार को डिप्टी सीएम बनाया जाता है। अजित पवार जब बीजेपी के साथ आते हैं तो तब कुछ ऐसे ही सवाल उठे थे कि जब शिवसेना टूट चुकी है और पर्याप्त संख्या भी विधानसभा में है तो फिर क्या जरूरत। इसको भी समझने के लिए लोकसभा चुनाव की ओर देखना जरूरी है। साथ ही बिहार और महाराष्ट्र के साथी दल वाले कनेक्शन को भी। महाराष्ट्र और बिहार सिर्फ इन दो राज्यों से ही लोकसभा की कुल 88 सीटें आती हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी दोनों साथ मिलकर लड़े और नतीजे बेहतर रहे। विधानसभा चुनाव में भी वैसा ही हुआ लेकिन सीएम पद को लेकर दोनों दूर हो गए। उद्धव ठाकरे विपक्षी खेमे में चले गए और सरकार बना लिए। सरकार बहुत दिन नहीं चली और उनकी पार्टी टूट गई। न केवल उद्धव बल्कि शरद पवार के सामने चुनौती काफी बड़ी हो गई है और बीजेपी उनकी मुश्किलों को कम नहीं होने दे रही है।

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