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गायब होता गया सरना-स्थल, बनते गए मंदिर! इतिहास लेखन में ‘आर्य की जगह आदिवासी नैरेटिव’ पर क्यों शुरू हुई नई चर्चा, जानें

‘आर्य केंद्रित इतिहास’ और ऐतिहासिक लेखन में ‘आर्य नैरेटिव’ की जगह इन दिनों ‘आदिवासी नैरेटिव’ पर नई चर्चा शुरू हुई है। इतिहास लेखन में ‘ट्राइबल नैरेटिव’ की बात करने वाले इतिहासकारों का मानना है कि देश में एक सुनियोजित तरीके से सदियों पुरानी आदिवासी सभ्यता पर दूसरी संस्कृति हावी होती गई। चाहे वो आदिवासियों के पूजा स्थल अंजन पर्वत के ‘अंजनधाम’ में बदलने की कहानी हो या फिर सुतियाम्बे में ‘मंदरा मुंडा’ के साम्राज्य के नागवंशी शासन में बदलने की कहानी हो। इतिहासकारों का मानना है कि एक लंबे कालखंड में आदिवासी देवी-देवताओं और राजाओं की कहानी को वैदिक समाज का हिस्सा बना दिया गया। झारखंड ही नहीं छत्तीसगढ़ की तारा, वज्र डाकिनी और दंतेश्वरी जैसी देवियों की कुछ दशक पहले तक सिर्फ आदिवासी समाज में ही पूजा होती थी, अब इन सभी देवियों को भी हिन्दू संस्कृति से जोड़ कर पूजा-पाठ की एक नई परंपरा की शुरुआत हुई है।

‘आर्य नैरेटिव से इतर आदिवासी नैरेटिव’ पर चर्चा

रांची में डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान की ओर से 28 से 30 अगस्त तक राष्ट्रीय आदिवासी इतिहास सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार में ‘ट्राइबल हिस्ट्रीः इश्यूज एंड पर्सपेक्टिव इन एन इमर्जिंग वर्ल्ड’ विषय पर अपनी बात को रखने के लिए देश भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों के इतिहासकार एकत्रित हुए। इस सेमिनार में पहली बार आर्य केंद्रित इतिहास और ऐतिहासिक लेखन में आर्य नैरेटिव से इतर आदिवासी नैरेटिव पर चर्चा हुई।

बिहार-बंगाल से लोग आए, आदिवासी दूसरे स्थान पर नहीं गए

देश के प्रतिष्ठित जेएनयू यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर राकेश बटबयाल ने आदिवासियों की सभ्यता-संस्कृति के साथ उनके राजनीतिक इतिहास पर गहन अध्ययन किया है। वे कहते हैं कि आखिर क्यों आदिवासियों की जमीन पर हनुमान बनाना आसान है, जबकि आदिवासी समाज के लोग किसी दूसरे स्थान पर सरना स्थल नहीं बना सकते हैं। लोग ऐसा करने भी नहीं देते हैं। उन्होंने कहा कि बंगाल और बिहार के कई हिस्सों से लोग झारखंड में आ कर बसे, लेकिन आखिर क्या कारण है कि यहां के आदिवासी बिहार और बंगाल में जाकर नहीं बस सके। उन्होंने कहा कि झारखंड से आज बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाओं और युवतियों को बाहर ले जाने की बात भी सामने आती हैं। आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के निदान तभी संभव है, जब उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को सही तरीके से समझा जा सके।

आदिवासी राजाओं का गौरवशाली इतिहास

विनाबो भावे विश्वविद्यालय के पूर्व प्रतिकुलपति ज्योति लाल उरांव बताते है कि देश में आदिवासियों का इतिहास गौरवशाली इतिहास रहा है। आर्य सीमित संख्या में यूरोप से रोजी-रोटी की तलाश में भारत आये। वे असभ्य और बर्बर थे। उस वक्त देश में 16जनपद थे, आदिवासी राजाओं का विशाल साम्राज्य था। लेकिन धीरे-धीरे आदिवासी राजाओं का शासन समाप्त हो गया। कई ऐतिहासिक तथ्यों से यह प्रमाणित भी होता है, जो असभ्य और बर्बर होते हैं, वहीं शासन करते हैं। इसके बावजूद ऐतिहासिक प्रमाण है कि कई आक्रमणकारी और मुस्लिम शासकों के सेनापति आदिवासी ही थे और सेना में बड़ी संख्या में आदिवासी शामिल होते थे।

गांव-गांव में ब्राह्मण परिवारों के पहुंचने से आदिवासी संस्कृति प्रभावित

ज्योति लाल उरांव कहते है कि समुद्रगुप्त के शासनकाल में भी झारखंड क्षेत्र में बड़ी संख्या में सेना को भेजा गया, लेकिन यहां उसे सफलता नहीं मिली। जिसके बाद समुद्रगुप्त ने झारखंड के हर गांव में ब्राह्मण परिवारों को भेजना शुरू किया। गांव में ब्राह्मण पहुंचे और मंदिर बनाकर पूजा-पाठ करने लगे। बाद में वे गांव में मुखिया-प्रधान बन गए। आदिवासियों को भी अपनी ओर आकषित करने लगे। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ब्राह्मणों के कारण आदिवासी समाज भी वैदिक संस्कृति की ओर आकर्षित हुआ। झारखंड का इतिहास यह बताता है कि यहां के आदिवासियों ने अंग्रेजों की भी कभी दासता स्वीकार नहीं की। अनेक लड़ाई लड़ी गई, लेकिन इतिहास में उसे पर्याप्त जगह नहीं मिला।

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