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जब भारत के लिए संविधान सभा में हरगोविंद पंत ने रखी थी सबसे मजबूत दलील

देश का नाम भारत करने की खबरों के बाद से विपक्ष सत्ता पक्ष पर लाल है। उधर, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) विरोधियों को संविधान पढ़ने की नसीहत दे रहा है। 18 सितंबर से होने वाले संसद के विशेष सत्र को भी इससे ही जोड़कर देखा जा रहा है। संविधान सभा की बहस के दौरान भी इंडिया और भारत को लेकर जोरदार तर्क चले थे। उस दौरान कांग्रेस से जुड़े और संविधान सभा के सदस्य हरगोविंद पंत ने इंडिया नाम का जोरदार विरोध किया था। उन्होंने तर्कों के साथ कहा था कि देश का नाम केवल भारत या भारतवर्ष होना चाहिए।

अब जी-20 के डिनर इनविटेशन के लिए राष्ट्रपति भवन की तरफ से भेजे गए कार्ड पर ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ लिखा है। इसे लेकर विपक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया है। विपक्षी दल तर्क दे रहे हैं कि उनके I.N.D.I.A. गठबंधन के कारण सरकार देश का नाम बदलना चाहती है। ऐसी भी चर्चा चल रही है कि संसद के विशेष सत्र के दौरान सरकार इंडिया की जगह भारत नाम करने का प्रस्ताव ला सकती है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने विपक्ष के विरोध पर कहा कि आखिर भारत नाम में दिक्कत क्या है। उन्होंने कहा कि संविधान में भी लिखा है, ‘इंडिया डैट इज भारत’ यानी इंडिया जोकि भारत है। उन्होंने कहा कि सभी को संविधान पढ़ना चाहिए।

इंडिया बनाम भारत का क्या है डिबेट

संविधान सभा में लंबी चर्चा के बाद आर्टिकल 1 में ये तय किया गया कि देश का अंग्रेजी नाम इंडिया होगा जबकि अन्य भाषाओं में उसे भारत कहेंगे। यानी इंडिया डैट इज भारत। द्रविड़ और तमिल भाषा में देश को भारता, मलयालम में भारतम् और तेलुगू में भारत देशम कहा जाता है। हिंदी में संविधान को ‘भारत का संविधान’ कहा जाता है। आर्टिकल 1 में कहा गया है कि भारत का अर्थ इंडिया होगा जो राज्यों का संघ होगा।

संविधान सभा की बहस

29 अगस्त 1947 को देश के संविधान बनाने के लिए डॉ भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में संविधान सभा (Constituent Assembly) का गठन किया गया था। करीब दो साल बाद लंबी चर्चा के बाद 18 सितंबर 1949 को ‘इंडिया डैट इज भारत’ नाम को स्वीकृति दी गई। हालांकि, हरगोविंत पंत ने इसका विरोध किया था और कहा था कि देश का नाम भारत या भारतवर्ष होना चाहिए।

हरगोविंद पंत ने दिया था भारत के पक्ष में तर्क

संविधान सभा की बहस में हरगोविंद पंत ने इंडिया की बजाय भारत या भारतवर्ष के पक्ष में दलीलें दी थीं। उन्होंने संविधान सभा की बैठक में कहा, ‘मैं देश के नाम को लेकर एक प्रस्ताव रख रहा हूं। हमे इंडिया की जगह भारत या भारतवर्ष किया जाना चाहिए। मुझे ये जानकर खुशी हो रही है कि नाम में बदलाव को स्वीकार किया गया है।’ पंत ने तर्क दिया, ‘पुरातन काल से हमारे देश को भारत या भारतवर्ष के नाम से संबोधित किया जाता है। ये शब्द उत्साह और साहस को दर्शाता है।’

पंत ने पूछा, आखिर इंडिया से इतना लगाव क्यों?

पंत ने कहा कि जहां तक ‘इंडिया’ शब्द की बात है तो मुझे ये समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इससे इतना लगाव क्यों है? हमें यह जानना चाहिए कि ये नाम विदेशियों ने हमें दिया था। उन विदेशियों ने हमारी स्वतंत्रता छीन ली और देश की संपत्ति को हथिया लिया था। अगर इसके बाद भी हम ‘इंडिया’ शब्द को चुनते हैं तो इससे साबित होगा कि हमें जरा भी शर्म नहीं होगी एक ऐसे नाम पर जो विदेशियों ने हमपर थोपा था। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि हम क्यों इस शब्द को स्वीकार कर रहे हैं।

यूनाईटेड प्रोविंस के हिल्स जिलों के प्रतिनिधि के दौर पर पंत ने साफ किया था वह केवल भारतवर्ष नाम चाहते हैं। हालांकि पंत का प्रस्ताव पूरी तरह से संविधान सभा में स्वीकृत नहीं किया गया था। बाद में आर्टिकल 1 में इंडिया डैट इज भारत नाम रखा गया।


कौन थे हरगोविंद पंत?

हरगोविंद पंत स्वतंत्रता सेनानी थे। वह कुमाऊं हिल्स (उत्तराखंड) के प्रवक्ता भी हुआ करते थे। वह उत्तराखंड में 19 मई 1885 अल्मोड़ा के चित्तेई गांव में पैदा हुए थे। 1909 में उन्होंने इलाहाबाद के स्कूल ऑफ लॉ से एलएलबी की डिग्री हासिल की थी। 1910 में उन्होंने रानीखेत में वकालत करनी शुरू कर दी। ये वो दौर था जिस वक्त राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता की मांग जोर पकड़ रही थी। 1925 में पंत अल्मोड़ा तीन साल के लिए जिला परिषद के अध्यक्ष चुने गए थे। उन्होंने अपने इलाके में सामाजिक बदलाव को अपना लक्ष्य बनाया था। उन्होंने यहां बच्चों के लिए प्राइमरी और मिडिल स्कूल खोले थे। उन्होंने छात्रों को राष्ट्रभक्ति गीत सीखने की दलील दी थी। पंत ने नमक सत्याग्रह और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें नजरबंद भी किया गया था। आजादी के बाद वह संविधान सभा के सदस्य भी बने थे। 1957 में हरगोविंद लोकसभा के लिए चुने गए और बाद में लोकसभा में डेप्युटी स्पीकर बने थे। इसी साल पंत का निधन भी हो गया था।

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