क्या मालदीव भूल गया ‘ऑपरेशन कैक्टस’ का वह अहसान, भारतीय जवानों की शौर्य गाथा आज भी करती है हैरान
सोशल मीडिया पर लोग कहने लगे कि लाखों रुपये खर्च कर मालदीव जाने से बेहतर है कि लक्षद्वीप जाएं। लक्षद्वीप की तारीफ चीन की कठपुतली बने मालदीव को नागवार गुजरी। नीले समंदर मालदीव के कुछ मंत्रियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई टिप्पणियों पर कड़ी चिंता व्यक्त की गई। तीन मंत्रियों ने लक्षद्वीप की यात्रा के बाद एक्स पर पीएम मोदी के पोस्ट के लिए उनकी आलोचना की थी और कहा था कि यह केंद्र शासित प्रदेश को मालदीव के वैकल्पिक पर्यटन स्थल के रूप में पेश करने का एक प्रयास है। हालांकि तीन मंत्रियों को निलंबित कर दिया जाता है। हाल फिलहाल के बयान और मालदीव का स्टैंड यह बताता है कि वह चीन के हाथों में खेल रहा है। मालवीद शायद भूल गया है कि भारत के उस पर कितने अहसान हैं। मालदीव शायद ऑपरेशन कैक्टस का अहसान भूल गया है। भारत नहीं होता तो शायद मालदीव पर किसी और का ही कब्जा होता।
भारत को छोड़ कोई देश नहीं आया मदद के लिए

बात 1988 की है जब मालदीव बुरी तरह संकट में घिर गया था। नवंबर का महीना और मालदीव की राजधानी में खुलेआम सड़कों पर नकाबपोश हथियारबंद हत्यारे खुलेआम घूम रहे थे। 3 नवंबर मालदीव की राजधानी पर सुनियोजित घुसपैठियों ने दोतरफा हमला बोला। उस वक्त वहां के राष्ट्रपति थे मामून अब्दुल गय्यूम। गय्यूम खतरा देख सुरक्षित स्थान पर जा छिपे और वहीं से कई देशों से मदद मांगी। अमेरिका, ब्रिटेन, श्रीलंका, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में इमरजेंसी संदेश भिजवाए गए लेकिन भारत को छोड़कर कोई देश सीधे मदद को आगे नहीं आया। पाकिस्तान ने तो हाथ खड़े कर लिए। उस वक्त भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मालदीव की मदद करने का फैसला किया।
ऑपरेशन कैक्टस ने बचाया मालदीव को

तत्कालीन राष्ट्रपति मामून अब्दुल गय्यूम जो कैद से भागने में सफल रहे उनके संदेश का भारत ने जवाब दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक मीटिंग बुलाई और पैराट्रूपर्स और नौसैनिक युद्धपोतों को द्वीप राष्ट्र में भेजा। हस्तक्षेप के अनुरोध के कुछ घंटों बाद 3 नवंबर 1988 की रात को ऑपरेशन कैक्टस शुरू हुआ। भारतीय पैराट्रूपर्स ने राष्ट्रपति को बचाया और जल्द ही राजधानी का नियंत्रण मालदीव सरकार को वापस कर दिया। कुछ भाड़े के सैनिकों को पकड़ लिया गया और सरकार को सौंप दिया गया। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के विजिटिंग फेलो डेविड ब्रूस्टर ने ‘इंडियाज ओसियन: द स्टोरी ऑफ इंडियाज बिड फॉर रीजनल लीडरशिप’ में लिखा है कि इस ऑपरेशन के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा मिली। एक वेबसाइट पर प्रकाशित पुस्तक के अंश में कहा गया है कि राष्ट्रपति रीगन ने इस मामले में भारत की निर्णायक कार्रवाई की सराहना की।



