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पुतिन नहीं चीन होगा यूरोप का ‘नया दुश्मन’, क्या एशिया में कदम रखेगा NATO?

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद 1949 में NATO की स्थापना की गई थी। यूरोप में दोबारा युद्ध न हो और सोवियत संघ को बढ़ने से रोका जाए यह इसकी स्थापना का उद्देश्य था। यूरोप में शांति और सुरक्षा बनाए रखने में इसने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि हाल के वर्षों में नाटो के सदस्यों ने इसकी प्रासंगिकता और प्रभाव पर सवाल खड़े किए हैं। साल 2019 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा था कि नाटो अब दिमागी रूप से मरा हुआ, पुराना और संपर्क से बाहर हो गया है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यूरोप पर रूस के आक्रमण से इस गठबंधन को एक नया जीवनदान मिला है। क्योंकि यूरोप की जमीन दूसरे विश्वयुद्ध के बार यूक्रेन के जरिए सबसे बड़े हमले का जवाब दे रहा है। नाटो अब यूरोप के पूर्वी हिस्से में अपनी सैन्य उपस्थिति को बढ़ाते हुए यूक्रेन को हथियार और विशेषज्ञता प्रदान कर रहा है। इसके अलावा यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद यूरोप की सुरक्षा से जुड़े सवाल पूछे जा रहे हैं। हालांकि अब यही मैक्रों कहते हैं कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने एक बिजली के झटके के साथ नाटो को जिंदा किया है।

चीन होगा नया दुश्मन

पिछले आठ दशकों में यूरोप ने यूक्रेन से सबसे बड़े शरणार्थी संकट को देखा है, हजारों लोग मारे गए और घायल हुए। वहीं लाखों लोग अपनी जमीन को छोड़ने पर मजबूर हुए। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन समेत नाटो के नेता लिथुआनिया में मीटिंग के लिए इकट्ठा हुए हैं, ऐसे में माना जा रहा है कि इसमें सबसे आगे यूक्रेन का मुद्दा होगा। यूक्रेन युद्ध ने दिखा दिया है कि नाटो का मजबूत रहना कितना जरूरी है। लेकिन लंबे समय के लिए नाटो के सामने पुतिन नहीं बल्कि चीन को सबसे बड़े दुश्मन के रूप में माना जा रहा है, जो यूरोप के तटों के करीब पहुंच गया है।

चीन के करीब जाएगा नाटो

कुछ नाटो सदस्य चीन को एक खतरे के रूप में देखते हैं। इसी कारण यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों को अपने साथ लाने का प्रयास कर रहे हैं। चीन के करीब नाटो सैन्य अभ्यास का भी इच्छुक है। लेकिन नाटो को इस उद्देश्य के लिए फिट रखना आसान काम नहीं है। कुछ सदसस्य इसे यूरोप से बाहर नहीं ले जाना चाहते हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि नाटो को अपना प्रभाव ड्रैगन के करीब तक ले जाना चाहिए, क्योंकि चीन के कदम यूरोप की ओर बढ़ने से नहीं रुकने वाले। हालांकि कुछ मानते हैं कि नाटो का बाहर जाना अमेरिका की विदेश नीति के लिए काम करने जैसा होगा। अभी यह एक बड़ा सवाल है कि नाटो अगले एक दशक में कहां होगा?

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