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क्‍यों भारत और कनाडा में नहीं चल सकती लंबे समय तक मुंह फुलव्‍वल? खेल कुछ अलग ही है

भारत और कनाडा के रिश्‍तों में अचानक तनाव आ गया है। इसके पीछे खालिस्‍तानी समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की हत्‍या है। तीन महीने पहले निज्‍जर की हत्‍या हुई थी। कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने बिना सुबूत इस हत्‍या का आरोप भारत के सिर मढ़ दिया। इसी के बाद दोनों देशों के समीकरण एकदम से बदल गए। भारत ने भी कनाडा को सख्‍त लहजे में जवाब दिया। इसने पूरी दुनिया का फोकस दोनों देशों की तरफ मोड़ दिया। दोनों देशों ने जब एक-दूसरे के टॉप डिप्‍लोमैट को अपने-अपने यहां से जाने को कहा तो इसने और चिंता पैदा कर दी। हालांकि, कनाडा और भारत के बीच जिस तरह के गहरे द्विपक्षीय संबंध हैं, उनमें लंबे समय तक मुंह फुलव्‍वल बनाए रख पाना मुश्किल है। यह खेल ही अलग लेवल का है। आइए, इसे समझने की कोशिश करते हैं।

कहां फंसी है पूरी गोट?
इन्वेस्ट इंडिया के मुताबिक, अप्रैल 2000 से मार्च 2023 तक लगभग 330 करोड़ डॉलर के कुल निवेश के साथ कनाडा भारत में 18वां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है। इस प्रकार कनाडाई निवेश भारत में कुल एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) प्रवाह का करीब 0.5 फीसदी है। 2022 में भारत कनाडा का नौवां सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर था। कनाडा से भारत में कुल एफडीआई निवेश में सेवाओं और बुनियादी ढांचे का योगदान 40.63 फीसदी था। आंकड़ों से पता चलता है कि 600 से ज्‍यादा कनाडाई कंपनियों की भारत में मौजूदगी है। 1,000 से ज्‍यादा कनाडाई कंपनियां भारतीय बाजार में सक्रिय रूप से कारोबार कर रही हैं।

वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 में कनाडा को भारत का कुल निर्यात 410.97 करोड़ डॉलर था। यह इसके पिछले वित्त वर्ष में भारत के कुल निर्यात 45,095.84 करोड़ डॉलर का 0.9 फीसदी था। दूसरी ओर वित्त वर्ष 2023 में कनाडा से भारत का कुल आयात 405.12 करोड़ डॉलर था। वर्ष के लिए यह भारत के 71404.24 करोड़ डॉलर के कुल आयात का लगभग 0.6 फीसदी था। कनाडा को भारत के निर्यात में फार्मास्यूटिकल्स, रत्न-आभूषण, कपड़ा और मशीनरी शामिल हैं। जबकि कनाडा के भारत को निर्यात में दालें, लकड़ी, लुगदी, कागज और खनन उत्पाद हैं। अगर रेमिटेंस के बारे में बात करें तो विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में भारत को कनाडा से रेमिटेंस में लगभग 85.98 करोड़ डॉलर प्राप्त हुए।

आंकड़ों से साफ हैं कुछ बातें
इन आंकड़ों से कुछ बातें बहुत साफ हो जाती हैं। दोनों के पास एक-दूसरे और दुनिया को देने के लिए अलग-अलग चीजें हैं। यानी ये दोनों ग्‍लोबल मार्केट में कॉम्पिटिटर के बजाय कॉम्पिलीमेंटरी रोल में दिखते हैं। दूसरे शब्‍दों में समझें तो जो चीजें कनाडा के पास हैं, उनकी भारत को जरूरत है। वहीं, भारत में जिन चीजों की प्रचुरता है, उसे कनाडा को चाहिए। इस तरह दोनों में किसी तरह की प्रतिस्‍पर्धा नहीं है। यह बात चीन जैसे मुल्‍कों के साथ नहीं है। भारत के साथ इंटरनेशनल मार्केट में वह कई क्षेत्रों में प्रतिस्‍पर्धा करता है।

भारतीयों का दूसरा घर बनता जा रहा है कनाडा
अब एक बिल्‍कुल ही अलग पहलू की बात करते हैं। यह है माइग्रेशन की। पिछले कुछ दशकों में कनाडा में भारतीयों की संख्‍या लगातार बढ़ी है। इसकी वजह कनाडा की पॉलिसी है। बड़ी संख्‍या में भारतीय टूअरिस्‍ट और छात्र कनाडा पहुंचते हैं। फिर वे वहीं के हो जाते हैं। कनाडा का पॉइंट बेस्‍ड इमिग्रेशन सिस्‍टम भारतीयों को लुभाता है। इसके तहत वहां पढ़ने वाले स्‍टूडेंट्स को अतिरिक्‍त पॉइंट मिलते हैं। छात्रों को पोस्‍ट ग्रेजुएट वर्क परमिट मिलता है। अगर नियोक्‍ता थोड़ी मदद करे तो प्रोविंशियल नॉमिनी प्रोग्राम के तहत परमानेंट रेजिडेंट का रास्‍ता भी खुल जाता है। एक्‍सपर्ट्स भी मानते हैं कि भारत और कनाडा के बीच यह तनातनी लंबी टिकने वाली नहीं है। दोनों के आपसी रिश्‍ते ऐसे हैं जिनसे एक झटके में यह गुस्‍सा गर्मी दूर हो जाएगी। किसी भी तरह से इसकी तुलना पाकिस्‍तान या चीन के साथ भारत के रिश्‍तों से नहीं करनी चाहिए।

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