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वैज्ञानिकों से मेल, बाबुओं को जेल! जोखिम तो दोनों लेते हैं, फिर असफलता पर दोहरा रवैया क्यों?

कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन
यह सच है कि सफलता का श्रेय लेने वालों की कोई कमी नहीं होती, लेकिन विफलता की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। लेकिन चंद्रयान-2 की विफलता से चंद्रयान-3 की सफलता तक की यात्रा से पता चलता है कि एक ऐसा लीडरशिप कल्चर जिसमें विफलता की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ा जाता है बल्कि इसे सहर्ष स्वीकार किया जाता है, अभूतपूर्व सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। मुझे याद है कि जब 2019 में चंद्रयान-2 विफल हुआ तो इसरो के वैज्ञानिकों में मायूसी घर कर गई थी, और फिर हमारे पीएम नरेंद्र मोदी ने बिल्कुल रुआंसे इसरो प्रमुख के. सिवन को बाहों में समेटकर देर तक गले लगाए रखा। उस दिन उनके प्रेरणा के शब्द थे, ‘भारत आपके साथ गर्व और आभार के साथ खड़ा है… आज से सीख हमें मजबूत और बेहतर बनाएगी… बहुत जल्द एक नई सुबह और एक उज्जवल कल होगा।’

इसरो के वैज्ञानिक जानते थे कि चंद्रयान-2 की असफलता के बाद उन्हें अनाथ नहीं छोड़ दिया गया। भारत को इस गाथा से दो महत्वपूर्ण सबक सीखने की जरूरत है।

विफलता का जश्न मनाने’ के जुमले से असली बात दब जाती है। हमें ‘नए विफलताओं’ और ‘अक्षम विफलताओं’ में अंतर करके, विफलता का नहीं, विफलता से सीखने का जश्न मनाना चाहिए। नई तकनीकी, व्यावसायिक या नीति निर्माण मॉडल बनाने के प्रयास कई अज्ञात अनजानेपन से भरे हुए हैं। ये ‘विफलताएं’ आगे के रास्तों के बारे में बहुमूल्य सबक प्रदान करती हैं। लेकिन विफलता बहुत कम दिमाग लगाकर गलत निष्कर्ष पर पहुंचने, दोषपूर्ण विश्लेषण, पारदर्शिता की कमी और खराब प्रबंधन के कारण भी हो सकती है। ऐसी विफलताओं को सहन करने से केवल अक्षमता और आलस्य पैदा होता है।

विफलता के प्रति सहिष्णुता की संस्कृति के लिए योग्यता प्रणाली की संस्कृति (मेरिटोक्रेसी कल्चर) की आवश्यकता होती है। इसरो की क्षमता को देखते हुए देश के टैक्सपेयर विश्वास कर सकते हैं कि इसरो की विफलताएं ‘नई’ हैं, न कि ‘अक्षम’। चंद्रयान-2 की विफलता के हर पहलू का गंभीरता से विश्लेषण करके इसरो ने सीखा है, यह चंद्रयान-3 की सफलता से साबित हुआ है।

लेकिन टैक्सपेयर कई रिसर्च एंड पॉलिसी इंस्टिट्यूट्स को फंड देते हैं। क्या उनकी विफलताएं ‘नई’ हैं या ‘अक्षम’? पिछले दो दशकों में प्रति संस्थान शोध प्रकाशनों के आधार पर आईआईटी और डीएई के साथ 253 पिछड़े संस्थानों की तुलना से पता चलता है कि पिछड़ों का रिसर्च आउटपुट बहुत कम है। आईआईएम और डीआरडीओ प्रति वर्ष केवल आठ और 11 प्रकाशन प्रकाशित करते हैं, आईआईटी और डीएई क्रमशः 331 और 229 प्रकाशनों के साथ उनसे बहुत आगे हैं।

चूंकि भारत कुल रिसर्च पब्लिकेशनों में पांचवें स्थान पर है, लेकिन प्रति पब्लिकेशन, साइटेशनों में शीर्ष-10 देशों में सबसे निचले स्थान पर है। इनमें से कोई भी पिछड़ा संस्थान यह दावा नहीं कर सकता कि उनका रिसर्च आउटपुट भले ही कम हो लेकिन बेहद हाई क्वॉलिटी का है; आखिरकार, साइटेशनों से ही पता चलता है कि कोई रिसर्च पब्लिकेशन कितना पाथ-ब्रेकिंग है। इसरो में निवेश के विपरीत टैक्सपेयर का इन पिछड़े संस्थानों में निवेश मुख्य रूप से ‘अक्षम विफलताओं’ को हासिल करता ही दिखता है।

जब इसरो भारत को दुनिया के शीर्ष चार देशों में पहुंचा सकता है, तो हर सार्वजनिक संस्थान अनुसंधान उत्पादकता में टॉप 100 में रैंक क्यों नहीं कर सकता? टैक्सपेयर को पूरे जोशो-खरोश से मांग करनी चाहिए: खुद को खड़ा करें, टॉप 100 में रैंक करें, वरना आपको एक पैसा नहीं मिलेगा!

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