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खतरे को खत्म करने का अधिकार सिर्फ अमेरिका को नहीं, निज्जर पर भारत को घेरने की हिमाकत न करे पश्चिम

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर छाती पीट रहे हैं। भारत पर उनके बेबुनियाद आरोप पर अमेरिका भी साथ दे रहा है। हैरत की बात है कि यही अमेरिका पाकिस्तान, ईरान दुनिया के कई देशों में अपने खतरों का खात्मा कर चुका है। इतना ही नहीं, अमेरिका कभी लोकतंत्र की रक्षा तो कभी आतंक विरोधी अभियान के बहाने हाई प्रोफाइल हत्याएं करता रहा है। लेकिन आज जब भारत विरोधी साजिशों में शामिल खालिस्तानी निज्जर मारा गया तो उसके सुर बदल गए हैं। पश्चिमी देशों के दोहरेपन का यह इतिहास बहुत पुराना है। अंग्रेजी न्यूज वेबसाइट द हिंदुस्तान टाइम्स में शिशिर गुप्ता ने एक लेख में दोहरेपन के ऐसे ही उदाहरण गिनाकर पश्चिमी देशों की बखिया उधेड़ी है। उन्होंने लेख की शुरुआत में ही बताया है कि कैसे अमित शाह ने कुछ साल पहले अमेरिकी राजदूत को आईना दिखाया था।

लेख में कहा गया है, ‘कुछ साल पहले, जब अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष थे, तब अमेरिका के तत्कालीन राजदूत भारत आए और उनसे मुलाकात की। शाह ने राजदूत का सम्मान किया, लेकिन जब राजदूत ने भारत में मानवाधिकार की स्थिति पर चर्चा शुरू की, तो शाह ने उन्हें बताया कि अमेरिका को मानवाधिकार पर उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि अमेरिका में 18वीं शताब्दी में बाहर से आए गोरों ने मूल अमेरिकियों का नरसंहार किया था।’

दरअसल, अमेरिका और कनाडा के दोहरे मापदंड आज भी दिखाई देते हैं। निज्जर पर भारत में लोगों की हत्या के लिए सुपारी लेने का आरोप था। उसके खिलाफ 10 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की गई थीं। इसके बावजूद, कनाडा और अमेरिका भारत को कठघरे में खड़ा करने के लिए बेताब हैं। कनाडा और अमेरिका इस बात को साबित करने के लिए बेताब हैं कि खालिस्तान टाइगर फोर्स (केटीएफ) के आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के पीछे भारतीय एजेंट थे। हालांकि, उनके पास कोई सबूत नहीं है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और उनकी न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) के नेता और खालिस्तान समर्थक जगमीत सिंह ने पहले ही बिना किसी सबूत के भारत को दोषी ठहरा दिया है। अमेरिका भी कनाडा की मदद कर रहा है।

लेखक का सीधा आरोप है कि जब कश्मीर में आग नहीं लगी है, तो ट्रूडो ने अमेरिकी खुफिया और प्रोपेगेंडा मीडिया की मदद से भारत को बदनाम करने के लिए खालिस्तान को हथियार बनाया गया है। यही वजह है कि भारतीय खुफिया प्रमुख ने सीआईए निदेशक से कहा कि वे एसएफजे आतंकी जीएस पन्नू के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते हैं क्योंकि वह असल में सीआईए एजेंट है और लैंगली की ओर से बल्लेबाजी कर रहा है। वरना क्या बात है कि अमेरिका और कनाडा की दोहरी नागिरकता रखने वाला पन्नू खुले तौर पर भारतीय राजनयिकों की हत्याओं और तिरंगे को जलाने की अपील करता है और सीआईए चुप रहती है?

पिछले एक दशक में भारत ने कनाडा और अमेरिका, दोनों को खालिस्तान के समर्थकों पर डोजियर जमा करने के बावजूद, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। कश्मीर में सीमा पार पाकिस्तानी आतंकवाद को अमेरिका ने तब स्वीकार किया जब 9/11 के हमले से पूरा अमेरिका दहल उठा। संभवतः अब सीआईए और कनाडाई खुफिया एजेंसियां खालिस्तानी कट्टरपंथियों से प्रेरित आतंकवादी हमले का इंतजार कर रही हैं। हालांकि, पूरी घटना और ट्रूडो द्वारा अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए किए गए षड्यंत्र और भारत को प्रतिबंधित करने के लिए पश्चिम के बड़े एजेंडे से आतंकवाद पर पश्चिमी दोहरे मानकों की बदबू आती है। सवाल यह है कि तालिबान के दूसरे प्रमुख और पाकिस्तानी नागरिक मुल्ला मंसूर अख्तर की पाकिस्तान में अमेरिकी ड्रोन से हत्या किस आधार पर की गई थी? बगदाद में अमेरिका ने किस आधार पर ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या की थी? पश्चिम किस आधार पर बमवर्षक विमानों का उपयोग करके अफ्रीका के साहिल क्षेत्र पर बमबारी कर रहा है?

पूरे उत्तरी अफ्रीका को अरब स्प्रिंग के जरिए बर्बाद कर दिया गया था जिसमें हजारों लोग मारे गए थे और लाखों लोग विस्थापित हुए थे। ये सभी एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल एक्शन आंतकवाद विरोधी अभियानों के नाम पर लिए गए जिन पर संयुक्त राष्ट्र या किसी भी देश ने सवाल नहीं उठाया था। भले ही आतंकवादी निज्जर की हत्या के पीछे मोदी सरकार नहीं है, लेकिन अन्य सभी देशों की तरह भारत को भी कनाडा जैसे तीसरे देशों में शरण लेने वाले कट्टरपंथियों, चरमपंथियों और आतंकवादियों से उत्पन्न खतरे से खुद को बचाने का अधिकार है। क्या पश्चिमी देश इन तथ्यों से इनकार कर पाएंगे?

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